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37. अस-साफ़्फ़ात    [ कुल आयतें - 182 ]

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सुरु अल्लाह के नाम से
जो बड़ा कृपाशील अत्यन्त दयावान है।
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●═══════════════════✒
गवाह है परा जमाकर पंक्तिबद्ध होनेवाले; (1)
_______________________________
   फिर डाँटनेवाले; (2)
_______________________________
फिर यह ज़िक्र करनेवाले (3)
_______________________________
कि तुम्हारा पूज्य-प्रभु अकेला है। (4)
_______________________________
 वह आकाशों और धरती और जो कुछ उनके बीच है सबका रब है औरपूर्व दिशाओं का भी रब है। (5)
_______________________________
हमने दुनिया के आकाश को सजावट अर्थात तारों से सुसज्जित किया, (रात में मुसाफ़िरों को मार्ग दिखाने) (6)
_______________________________
  और प्रत्येक सरकश शैतान सेसुरक्षित रखने के लिए। (7)
_______________________________
वे (शैतान) "मलए आला" की ओर कान नहीं लगा पाते और हर ओर सेफेंक मारे जाते हैं भगाने-धुतकारने के लिए। (8)
_______________________________
और उनके लिए अनवरत यातना है। (9)
_______________________________
किन्तु यह और बात है कि कोईकुछ उचक ले, इस दशा में एक तेज़ दहकती उल्का उसका पीछा करती है। (10)
_______________________________
अब उनसे पूछो कि उनके पैदा करने का काम अधिक कठिन है या उन चीज़ों का, जो हमने पैदा कररखी हैं। निस्संदेह हमने उनको लेसदार मिट्टी से पैदा किया।(11)
_______________________________
बल्कि तुम तो आश्चर्य में हो और वे हैं कि परिहास कर रहेहैं। (12)
_______________________________
और जब उन्हें याद दिलाया जाता है, तो वे याद नहीं करते, (13)
_______________________________
और जब कोई निशानी देखते हैं तो हँसी उड़ाते हैं। (14)
_______________________________
और कहते हैं, "यह तो बस एक प्रत्यक्ष जादू है। (15)
_______________________________
 क्या जब हम मर चुके होंगे और मिट्टी और हड्डियाँ होकर रह जाएँगे, तो क्या फिर हम उठाए जाएँगे? (16)
_______________________________
क्या और हमारे पहले के बाप-दादा भी?" (17)
_______________________________
कह दो, "हाँ! और तुम अपमानितभी होगे।"(18)
_______________________________
वह तो बस एक झिड़की होगी। फिर क्या देखेंगे कि वे ताकनेलगे हैं। (19)
_______________________________
और वे कहेंगे, "ऐ अफ़सोस हमपर! यह तो बदले का दिन है।" (20)
_______________________________
यह वही फ़ैसले का दिन है जिसे तुम झुठलाते रहे हो। (21)
_______________________________
(कहा जाएगा,) "एकत्र करो उन लोगों को जिन्होंने ज़ुल्म किया और उनके जोड़ीदारों को भी और उनको भी जिनकी अल्लाह से हटकर वे बन्दगी करते रहे हैं। (22)
_______________________________
फिर उन सबको भड़कती हुई आग की राह दिखाओ! (23)
_______________________________
और तनिक उन्हें ठहराओ, उनसे पूछना है, (24)
_______________________________
"तुम्हें क्या हो गया, जो तुम एक-दूसरे की सहायता नहीं कर रहे हो?" (25)
_______________________________
बल्कि वे तो आज बड़े आज्ञाकारी हो गए हैं। (26)
_______________________________
वे एक-दूसरे की ओर रुख़ करके पूछते हुए कहेंगे, (27)
_______________________________
"तुम तो हमारे पास आते थे दाहिने से (और बाएँ से)।" (28)
_______________________________
वे कहेंगे, "नहीं, बल्कि तुम स्वयं ही ईमानवाले न थे। (29)
_______________________________
और हमारा तो तुमपर कोई ज़ोर न था, बल्कि तुम स्वयं हीसरकश लोग थे। (30)
_______________________________
अन्ततः हमपर हमारे रब की बात सत्यापित होकर रही। निस्संदेह हमें (अपनी करतूत का) मज़ा चखना ही होगा।(31)
_______________________________
सो हमने तुम्हें बहकाया। निश्चय ही हम स्वयं बहके हुए थे।"(32)
_______________________________
अतः वे सब उस दिन यातना मेंएक-दूसरे के सह-भागी होंगे। (33)
_______________________________
हम अपराधियों के साथ ऐसा ही किया करते हैं। (34)    _______________________________
उनका हाल यह था कि जब उनसे कहा जाता कि "अल्लाह के सिवा कोई पूज्य-प्रभु नहीं है।" तोवे घमंड में आ जाते थे। (35)
_______________________________
और कहते थे, "क्या हम एक उन्मादी कवि के लिए अपने उपास्यों को छोड़ दें?" (36)
_______________________________
"नहीं, बल्कि वह सत्य लेकर आया है और वह (पिछले) रसूलों की पुष्टि में है। (37)
_______________________________
  निश्चय ही तुम दुखद यातना का मज़ा चखोगे। - (38)
_______________________________
तुम बदला वही तो पाओगे जो तुम करते हो।" -(39)
_______________________________
अलबत्ता अल्लाह के उन बन्दों की बात और है, जिनको उसने चुन लिया है। (40)
_______________________________
वही लोग हैं जिनके लिए जानी-बूझी नियत रोज़ी है,(41)
_______________________________
स्वादिष्ट फल। (42)
_______________________________
  और वे नेमत भरी जन्नतों(43)
_______________________________
में सम्मानपूर्वक होंगे, तख़्तों पर आमने-सामने विराजमान होंगे; (44)
_______________________________
उनके बीच विशुद्ध पेय का पात्र फिराया जाएगा, (45)
_______________________________
बिलकुल साफ़, उज्जवल, पीनेवालों के लिए सर्वथा सुस्वादु। (46)
_______________________________
  न उसमें कोई ख़ुमार होगा और न वे उससे निढाल और मदहोश होंगे। (47)
_______________________________
और उनके पास निगाहें बचाए रखनेवाली, सुन्दर आँखोंवाली स्त्रियाँ होंगी, (48)
_______________________________
मानो वे सुरक्षित अंडे हैं। (49)
_______________________________
  फिर वे एक-दूसरे की ओर रुख़करके आपस में पूछेंगे। (50)
_______________________________
उनमें से एक कहनेवाला कहेगा, "मेरा एक साथी था; (51)
_______________________________
जो कहा करता था, ‘क्या तुम भी पुष्टि करनेवालों में से हो? (52)
_______________________________
  क्या जब हम मर चुके होंगे और मिट्टी और हड्डियाँ होकर रह जाएँगे, तो क्या हम वास्तव में बदला पाएँगे’?" (53)
_______________________________
वह कहेगा, "क्या तुम झाँककर देखोगे?" (54)
_______________________________
फिर वह झाँकेगा तो उसे भड़कती हुई आग के बीच में देखेगा। (55)
_______________________________
कहेगा, "अल्लाह की क़सम! तुम तो मुझे तबाह ही करने को थे। (56)
_______________________________
यदि मेरे रब की अनुकम्पा न होती तो अवश्य ही मैं भी पकड़कर हाज़िर किए गए लोगों में से होता। (57)
_______________________________
है ना अब ऐसा कि हम मरने के नहीं। (58)
_______________________________
हमें जो मृत्यु आनी थी वह बस पहले आ चुकी। और न हमें कोईयातना ही दी जाएगी!" (59)
_______________________________
निश्चय ही यही बड़ी सफलता है। (60)
_______________________________
ऐसी ही चीज़ के लिए कर्म करनेवालों को कर्म करना चाहिए। (61)
_______________________________
क्या वह आतिथ्य अच्छा है या 'ज़क़्क़ूम' का वृक्ष? (62)
_______________________________
निश्चय ही हमने उस (वृक्ष) को ज़ालिमों के लिए परीक्षा बना दिया है। (63)
_______________________________
वह एक वृक्ष है जो भड़कती हुई आग की तह से निकलता है। (64)
_______________________________
उसके गाभे मानो शैतानों केसिर (साँपों के फन) हैं। (65)
_______________________________
तो वे उसे खाएँगे और उसी सेपेट भरेंगे। (66)
_______________________________
फिर उनके लिए उसपर खौलते हुए पानी का मिश्रण होगा। (67)
_______________________________
फिर उनकी वापसी भड़कती हुईआग की ओर होगी। (68)
_______________________________
निश्चय ही उन्होंने अपने बाप-दादा को पथभ्रष्ट पाया। (69)
_______________________________
   फिर वे उन्हीं के पद-चिन्हों पर दौड़ते रहे। (70)
_______________________________
और उनसे पहले भी पूर्ववर्ती लोगों में अधिकांश पथभ्रष्ट हो चुके हैं, (71)
_______________________________
   हमने उनमें सचेत करनेवाले भेजे थे। (72)
_______________________________
तो अब देख लो उन लोगों का कैसा परिणाम हुआ, जिन्हें सचेत किया गया था।(73)
_______________________________
अलबत्ता अल्लाह के उन बन्दों की बात और है, जिनको उसने चुन लिया है। (74)
_______________________________
नूह ने हमको पुकारा था, तो हम कैसे अच्छे हैं निवेदन स्वीकार करनेवाले! (75)
_______________________________
हमने उसे और उसके लोगों को बड़ी घुटन और बेचैनी से छुटकारा दिया। (76)
_______________________________
और हमने उसकी संतति (औलाद वअनुयायी) ही को बाक़ी रखा। (77)
_______________________________
और हमने पीछे आनेवाली नस्लों में उसका अच्छा ज़िक्र छोड़ा (78)
_______________________________
  कि "सलाम है नूह पर सम्पूर्ण संसारवालों में!" (79)
_______________________________
निस्संदेह हम उत्तमकारों को ऐसा ही बदला देते हैं। (80)
_______________________________
निश्चय ही वह हमारे ईमानवाले बन्दों में से था। (81)
_______________________________
फिर हमने दूसरों को डूबो दिया। (82)
_______________________________
और इबराहीम भी उसी के सहधर्मियों में से था। (83)
_______________________________
याद करो, जब वह अपने रब के समक्ष भला-चंगा हृदय लेकर आया; (84)
_______________________________
जबकि उसने अपने बाप और अपनी क़ौम के लोगों से कहा,"तुम किस चीज़ की पूजा करते हो? (85)
_______________________________
क्या अल्लाह से हटकर मनघड़ंत उपास्यों को चाह रहे हो? (86)
_______________________________
आख़िर सारे संसार के रब के विषय में तुम्हारा क्या गुमान है?" (87)
_______________________________
फिर उसने एक दृष्टि तारों पर डाली। (88)
_______________________________
और कहा, "मैं तो निढाल हूँ।" (89)
_______________________________
अतएव वे उसे छोड़कर चले गए पीठ फेरकर। (90)
_______________________________
फिर वह आँख बचाकर उनके देवताओं की ओर गया और कहा,"क्या तुम खाते नहीं? (91)
_______________________________
तुम्हें क्या हुआ है कि तुम बोलते नहीं?" (92)
_______________________________
फिर वह भरपूर हाथ मारते हुए उनपर पिल पड़ा। (93)
_______________________________
फिर वे लोग झपटते हुए उसकी ओर आए। (94)
_______________________________
उसने कहा, "क्या तुम उनको पूजते हो, जिन्हें स्वयं तराशते हो, (95)
_______________________________
जबकि अल्लाह ने तुम्हें भी पैदा किया है और उनको भी, जिन्हें तुम बनाते हो?"(96)
_______________________________
वे बोले, "उसके लिए एक मकान (अर्थात अग्नि-कुंड) तैयार करके उसे भड़कती आग में डाल दो!"(97)
_______________________________
अतः उन्होंने उसके साथ एक चाल चलनी चाही, किन्तु हमने उन्हीं को नीचा दिखा दिया। (98)
_______________________________
उसने कहा, "मैं अपने रब की ओर जा रहा हूँ, वह मेरा मार्गदर्शन करेगा। (99)
_______________________________
ऐ मेरे रब! मुझे कोई नेक संतान प्रदान कर।" (100)
_______________________________
तो हमने उसे एक सहनशील पुत्र की शुभ सूचना दी। (101)
_______________________________
फिर जब वह उसके साथ दौड़-धूप करने की अवस्था को पहुँचा तो उसने कहा, "ऐ मेरे प्रिय बेटे! मैं स्वप्न में देखता हूँ कि तुझे क़ुरबान कररहा हूँ। तो अब देख, तेरा क्याविचार है?" उसने कहा, "ऐ मेरे बाप! जो कुछ आपको आदेश दिया जारहा है उसे कर डालिए। अल्लाह ने चाहा तो आप मुझे धैर्यवान पाएँगे।" (102)
_______________________________
अन्ततः जब दोनों ने अपने आपको (अल्लाह के आगे) झुका दिया और उसने (इबाराहीम ने) उसे कनपटी के बल लिटा दिया (तोउस समय क्या दृश्य रहा होगा, सोचो!)। (103)
_______________________________
और हमने उसे पुकारा, "ऐ इबराहीम! (104)
_______________________________
तूने स्वप्न को सच कर दिखाया। निस्संदेह हम उत्तमकारों को इसी प्रकार बदला देते हैं।" (105)
_______________________________
निस्संदेह यह तो एक खुली हूई परीक्षा थी। (106)
_______________________________
और हमने उसे (बेटे को) एक बड़ी क़ुरबानी के बदले में छुड़ा लिया। (107)
_______________________________
और हमने पीछे आनेवाली नस्लों में उसका अच्छा ज़िक्र छोड़ा, (108)
_______________________________
 कि "सलाम है इबराहीम पर।" (109)
_______________________________
उत्तमकारों को हम ऐसा ही बदला देते हैं। (110)
_______________________________
निश्चय ही वह हमारे ईमानवाले बन्दों में से था। (111)
_______________________________
और हमने उसे इसहाक़ की शुभ सूचना दी, अच्छों में से एक नबी। (112)
_______________________________
और हमने उसे और इसहाक़ को बरकत दी। और उन दोनों की संतति में कोई तो उत्तमकार हैऔर कोई अपने आप पर खुला ज़ुल्म करनेवाला। (113)
_______________________________
और हम मूसा और हारून पर भी उपकार कर चुके हैं। (114)
_______________________________
और हमने उन्हें और उनकी क़ौम को बड़ी घुटन और बेचैनी से छुटकारा दिया। (115)
_______________________________
हमने उनकी सहायता की, तो वही प्रभावी रहे। (116)
_______________________________
हमने उनको अत्यन्त स्पष्ट किताब प्रदान की। (117)
_______________________________
और उन्हें सीधा मार्ग दिखाया। (118)
_______________________________
और हमने पीछे आनेवाली नस्लों में उसका अच्छा ज़िक्र छोड़ा। (119)
_______________________________
कि "सलाम है मूसा और हारून पर!" (120)
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निस्संदेह हम उत्तमकारों को ऐसा ही बदला देते हैं। (121)
_______________________________
निश्चय ही वे दोनों हमारे ईमानवाले बन्दों में से थे। (122)
_______________________________
और निस्संदेह इलयास भी रसूलों में से था। (123)
_______________________________
याद करो, जब उसने अपनी क़ौमके लोगों से कहा, "क्या तुम डर नहीं रखते? (124)
_______________________________
क्या तुम 'बअल' (देवता) को पुकारते हो और सर्वोत्तम स्रष्टा। को छोड़ देते हो; (125)
_______________________________
 अपने रब और अपने अगले बाप-दादा के रब, अल्लाह को!" (126)
_______________________________
किन्तु उन्होंने उसे झुठलादिया। सो वे निश्चय ही पकड़करहाज़िर किए जाएँगे।(127)
_______________________________
अल्लाह के उन बन्दों की बात और है, जिनको उसने चुन लिया है। (128)
_______________________________
और हमने पीछे आनेवाली नस्लों में उसका अच्छा ज़िक्र छोड़ा। (129)
_______________________________
कि "सलाम है इलयास पर!" (130)
_______________________________
निस्संदेह हम उत्तमकारों को ऐसा ही बदला देते हैं। (131)
_______________________________
निश्चय ही वह हमारे ईमानवाले बन्दों में से था। (132)
_______________________________
और निश्चय ही लूत भी रसूलों में से था। (133)    _______________________________
याद करो, जब हमने उसे और उसके सभी लोगों को बचा लिया (134)
_______________________________
सिवाय एक बुढ़िया के, जो पीछे रह जानेवालों में से थी।(135)
_______________________________
फिर दूसरों को हमने तहस-नहस करके रख दिया। (136)
_______________________________
और निस्संदेह तुम उनपर (उनके क्षेत्र) से गुज़रते हो कभी प्रातः करते हुए (137)
_______________________________
और रात में भी। तो क्या तुमबुद्धि से काम नहीं लेते? (138)
_______________________________
और निस्संदेह यूनुस भी रसूलों में से था।(139)
_______________________________
याद करो, जब वह भरी नौका की ओर भाग निकला, (140)
_______________________________
फिर पर्ची डालने में शामिलहुआ और उसमें मात खाई। (141)
_______________________________
फिर उसे मछली ने निगल लिया और वह निन्दनीय दशा में ग्रस्त हो गया था। (142)
_______________________________
अब यदि वह तसबीह करनेवाला न होता (143)
_______________________________
तो उसी के भीतर उस दिन तक पड़ा रह जाता, जबकि लोग उठाए जाएँगे। (144)
_______________________________
अन्ततः हमने उसे इस दशा मेंकि वह निढाल था, साफ़ मैदान में डाल दिया।(145)
_______________________________
हमने उसपर बेलदार वृक्ष उगाया था। (146)
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और हमने उसे एक लाख या उससेअधिक (लोगों) की ओर भेजा। (147)
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फिर वे ईमान लाए तो हमने उन्हें एक अवधि तक सुख भोगने का अवसर दिया।(148)
_______________________________
अब उनसे पूछो, "क्या तुम्हारे रब के लिए तो बेटियाँ हों और उनके अपने लिएबेटे? (149)
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क्या हमने फ़रिश्तों को औरतें बनाया और यह उनकी आँखोंदेखी बात है?" (150)
_______________________________
सुन लो, निश्चय ही वे अपनी मनघड़ंत कहते हैं (151)
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कि "अल्लाह के औलाद हुई है!" निश्चय ही वे झूठे हैं। (152)
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क्या उसने बेटों की अपेक्षा बेटियाँ चुन ली हैं? (153)
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तुम्हें क्या हो गया है? तुम कैसा फ़ैसला करते हो? (154)
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तो क्या तुम होश से काम नहीं लेते? (155)
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क्या तुम्हारे पास कोई स्पष्ट प्रमाण है? (156)
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तो लाओ अपनी किताब, यदि तुमसच्चे हो। (157)
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उन्होंने अल्लाह और जिन्नों के बीच नाता जोड़ रखाहै, हालाँकि जिन्नों को भली-भाँति मालूम है कि वे अवश्य पकड़कर हाज़िर किए जाएँगे- (158)
_______________________________
महान और उच्च है अल्लाह उससे, जो वे बयान करते हैं। - (159)
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अल्लाह के उन बन्दों की बात और है, जिन्हें उसने चुन लिया। (160)
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अतः तुम और जिनको तुम पूजते हो वे, (161)
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तुम सब अल्लाह के विरुद्ध किसी को बहका नहीं सकते, (162)
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सिवाय उसके जो जहन्नम की भड़कती आग में पड़ने ही वाला हो। (163)
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और हमारी ओर से उसके लिए अनिवार्यतः एक ज्ञात और नियत स्थान है। (164)
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और हम ही पंक्तिबद्ध करते हैं। (165)
_______________________________
और हम ही महानता बयान करते हैं। (166)
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  वे तो कहा करते थे (167)
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"यदि हमारे पास पिछलों की कोई शिक्षा होती (168)
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  तो हम अल्लाह के चुने हुए बन्दे होते।" (169)
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  किन्तु उन्होंने उसका इनकार कर दिया, तो अब जल्द ही वे जान लेंगे(170)
_______________________________
और हमारे अपने उन बन्दों के हक़ में, जो रसूल बनाकर भेजे गए, हमारी बात पहले ही निश्चित हो चुकी है। (171)
_______________________________
  कि निश्चय ही उन्हीं की सहायता की जाएगी। (172)
_______________________________
और निश्चय ही हमारी सेना ही प्रभावी रहेगी। (173)
_______________________________
 अतः एक अवधि तक के लिए उनसेरुख़ फेर लो (174)
_______________________________
और उन्हें देखते रहो। वे भी जल्द ही (अपना परिणाम) देख लेंगे। (175)
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क्या वे हमारी यातना के लिए जल्दी मचा रहे हैं? (176)
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  तो जब वह उनके आँगन में उतरेगी तो बड़ी ही बुरी सुबह होगी उन लोगों की, जिन्हें सचेत किया जा चुका है! (177)
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  एक अवधि तक के लिए उनसे रुख़ फेर लो (178)
_______________________________
 और देखते रहो, वे जल्द ही देख लेंगे। (179)
_______________________________
  महान और उच्च है तुम्हारा रब, प्रताप का स्वामी उन बातों से जो वे बताते हैं! (180)
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और सलाम है रसूलों पर; (181)
_______________________________
औऱ सब प्रशंसा अल्लाह, सारे संसार के रब के लिए है। (182)
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