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2.2 अल-बक़रा    [ कुल आयतें - 286 ]

सुरु अल्लाह के नाम से
जो बड़ा कृपाशील अत्यन्त दयावान है।
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और जब उनके पास अल्लाह की ओर से एक रसूल आया, जिससे उस (भविष्यवाणी) की पुष्टि हो रही है जो उनके पास थी, तो उनके एक गरोह ने, जिन्हें किताब मिली थी, अल्लाह की किताब को अपने पीठ पीछे डाल दिया, मानो वे कुछ जानते ही नहीं। (101)
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   और जो वे उस चीज़ के पीछे पड़ गए जिसे शैतान सुलैमान कीबादशाही पर थोपकर पढ़ते थे - हालाँकि सुलैमान ने कोई कुफ़्र नहीं किया था, बल्कि कुफ़्र तो शैतानों ने किया था; वे लोगों को जादू सिखाते थे - और न ही (ऐसा है जैसा कि वेकहते थे कि) बाबिल में दो फ़रिश्तों, हारूत और मारूत, पर जादू उतारा गया था। और वे (दो चालाक व्यक्ति) किसी को भीसिखाते न थे जब तक कि कह न देते, "हम तो बस एक परीक्षा हैं; तो तुम कुफ़्र में न पड़ना।" तो लोग उन दोनों से वहकुछ सीखते हैं, जिसके द्वारा पति और पत्नी में अलगाव पैदा कर दें - यद्यपि वे उससे किसी को भी हानि नहीं पहुँचा सकते थे। हाँ, यह और बात है कि अल्लाह के हुक्म से किसी को हानि पहुँचनेवाली ही हो - और वह कुछ सीखते हैं जो उन्हें हानि ही पहुँचाए और उन्हें कोई लाभ न पहुँचाए। और उन्हेंभली-भाँति मालूम है कि जो उसका ग्राहक बना, उसका आख़िरत में कोई हिस्सा नहीं। कितनी बुरी चीज़ के बदले उन्होंने अपने प्राणों का सौदा किया, यदि वे जानते (तो ठीक मार्ग अपनाते)।(102)
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    और यदि वे ईमान लाते और डर रखते, तो अल्लाह के यहाँ से मिलनेवाला बदला कहीं अच्छा था, यदि वे जानते (तो इसे समझ सकते) । (103)
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    ऐ ईमान लानेवालो! 'राइना' न कहा करो, बल्कि 'उनज़ुरना' कहो और सुना करो। और इनकार करनेवालों के लिए दुखद यातना है। (104)
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    इनकार करनेवाले नहीं चाहते, न किताबवाले और न मुशरिक (बहुदेववादी) कि तुम्हारे रब की ओर से तुमपर कोई भलाई उतरे, हालाँकि अल्लाह जिसे चाहे अपनी दयालुता के लिए ख़ास कर ले; अल्लाह बड़ा अनुग्रह करनेवाला है। (105)
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    हम जिस आयत (और निशान) को भीमिटा दें या उसे भुला देते हैं, तो उससे बेहतर लाते हैं या उस जैसी दूसरी ही। क्या तुम जानते नहीं हो कि अल्लाह को हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है? (106)
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    क्या तुम नहीं जानते कि आकाशों और धरती का राज्य अल्लाह ही का है और अल्लाह से हटकर न तुम्हारा कोई मित्र हैऔर न सहायक? (107)
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    (ऐ ईमानवालो! तुम अपने रसूलके आदर का ध्यान रखो) या तुम चाहते हो कि अपने रसूल से उसी प्रकार से प्रश्न और बात करो, जिस प्रकार इससे पहले मूसा सेबात की गई है? हालाँकि जिस व्यक्ति ने ईमान के बदले इनकार की नीति अपनाई, तो वह सीधे रास्ते से भटक गया (108)
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    बहुत-से किताबवाले अपने भीतर की ईर्ष्या से चाहते हैंकि किसी प्रकार वे तुम्हारे ईमान लाने के बाद फेरकर तुम्हे इनकार कर देनेवाला बना दें, यद्यपि सत्य उनपर प्रकट हो चुका है, तो तुम दरगुज़र (क्षमा) से काम लो और जाने दो यहाँ तक कि अल्लाह अपना फ़ैसला लागू कर दे। निस्संदेह अल्लाह को हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है। (109)
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    और नमाज़ क़ायम करो और ज़कात दो और तुम स्वयं अपने लिए जो भलाई भी पेश करोगे, उसेअल्लाह के यहाँ मौजूद पाओगे। निस्संदेह जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसे देख रहा है। (110)
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   और उनका कहना है, "कोई व्यक्ति जन्नत में प्रवेश नहीं कर सकता सिवाय उसके जो यहूदी है या ईसाई है।" ये उनकी अपनी निराधार कामनाएँ हैं। कहो, "यदि तुम सच्चे हो तो अपने प्रमाण पेश करो।"(111)
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   क्यों नहीं, जिसने भी अपने-आपको अल्लाह के प्रति समर्पित कर दिया और उसका कर्मभी अच्छे से अच्छा हो तो उसका प्रतिदान उसके रब के पास है और ऐसे लोगों के लिए न तो कोई भय होगा और न वे शोकाकुल होंगे। (112)
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   यहूदियों ने कहा, "ईसाइयों की कोई बुनियाद नहीं।" और ईसाइयों ने कहा, "यहूदियों की कोई बुनियाद नहीं।" हालाँकि वे किताब का पाठ करते हैं। इसी तरह की बात उन्होंने भी कही है जो ज्ञान से वंचित हैं। तो अल्लाह क़ियामत के दिनउनके बीच उस चीज़ के विषय में निर्णय कर देगा, जिसके विषय में वे विभेद कर रहे हैं।(113)
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    और उससे बढ़कर अत्याचारी और कौन होगा जिसने अल्लाह की मस्जिदों को उसके नाम के स्मरण से वंचित रखा और उन्हेंउजाड़ने पर उतारू रहा? ऐसे लोगों को तो बस डरते हुए ही उसमें प्रवेश करना चाहिए था। उनके लिए संसार में रुसवाई (अपमान) है और उनके लिए आख़िरतमें बड़ी यातना नियत है। (114)
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    पूरब और पश्चिम अल्लाह ही के हैं, अतः जिस ओर भी तुम रुख़ करो उसी ओर अल्लाह का रुख़ है। निस्संदेह अल्लाह बड़ी समाईवाला (सर्वव्यापी) सर्वज्ञ है। (115)
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    कहते हैं, अल्लाह औलाद रखता है - महिमावाला है वह! (पूरब और पश्चिम ही नहीं, बल्कि) आकाशों और धरती में जो कुछ भी है, उसी का है। सभी उसके आज्ञाकारी हैं।(116)
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    वह आकाशों और धरती का प्रथमतः पैदा करनेवाला है। वह तो जब किसी काम का निर्णय करता है तो उसके लिए बस कह देता है कि "हो जा" और वह हो जाता है। (117)
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    जिन्हें ज्ञान नहीं वे कहते हैं, "अल्लाह हमसे बात क्यों नहीं करता? या कोई निशानी हमारे पास आ जाए।" इसी प्रकार इनसे पहले के लोग भी कह चुके हैं। इन सबके दिल एक जैसे हैं। हम खोल-खोलकर निशानियाँ उन लोगों के लिए बयान कर चुके हैं जो विश्वास करें। (118)
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   निश्चित रूप से हमने तुम्हें हक़ के साथ शुभ-सूचनादेनेवाला और डरानेवाला बनाकरभेजा। भड़कती आग में पड़नेवालों के विषय में तुमसे कुछ न पूछा जाएगा। (119)
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    न यहूदी तुमसे कभी राज़ी होनेवाले हैं और न ईसाई, जब तककि तुम उनके पंथ पर न चलने लग जाओ। कह दो, "अल्लाह का मार्गदर्शन ही वास्तविक मार्गदर्शन है।" और यदि उस ज्ञान के पश्चात जो तुम्हारे पास आ चुका है, तुमने उनकी इच्छाओं का अनुसरण किया तो अल्लाह से बचानेवाला न तो तुम्हारा कोई मित्र होगा और नसहायक। (120)
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   जिन लोगों को हमने किताब दीहै उनमें वे लोग जो उसे उस तरहपढ़ते हैं जैसा कि उसके पढ़नेका हक़ है, वही उसपर ईमान ला रहे हैं, और जो उसका इनकार करेंगे, वही घाटे में रहनेवाले हैं। (121)
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    ऐ इसराईल की सन्तान! मेरी उस कृपा को याद करो जो मैंने तुमपर की थी और यह कि मैंने तुम्हें संसारवालों पर श्रेष्ठता प्रदान की। (122)
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    और उस दिन से डरो, जब कोई न किसी के काम आएगा, न किसी की ओर से अर्थदंड स्वीकार किया जाएगा और न कोई सिफ़ारिश ही उसे लाभ पहुँचा सकेगी और न उनको कोई सहायता ही पहुँच सकेगी। (123)
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    और याद करो जब इबराहीम की परीक्षा उसके रब ने कुछ बातोंमें ली तो उसने उनको पूरा कर दिखाया। उसने (रब ने) कहा, "मैंतुझे सारे इनसानों का पेशवा बनानेवाला हूँ।" उसने निवेदन किया, "और मेरी सन्तान में से भी।" उसने (रब ने) कहा, "ज़ालिममेरे इस वादे के अन्तर्गत नहीं आ सकते।" (124)
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   और याद करो जब हमने इस घर (काबा) को लोगों को लिए केन्द्र और शान्तिस्थल बनाया- और, "इबराहीम के स्थल में से किसी जगह को नमाज़ की जगह बना लो।" - और इबराहीम और इसमाईल को ज़िम्मेदार बनाया कि "तुम मेरे इस घर को तवाफ़ करनेवालों और एतिकाफ़ करनेवालों के लिए और रुकू और सजदा करनेवालों के लिए पाक-साफ़ रखो।"(125)
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    और याद करो जब इबराहीम ने कहा, "ऐ मेरे रब! इसे शान्तिमय भू-भाग बना दे और इसके उन निवासियों को फलों की रोज़ी दे जो उनमें से अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान लाएँ।" (रबने) कहा, "और जो इनकार करेगा थोड़ा फ़ायदा तो उसे भी दूँगा, फिर उसे घसीटकर आग की यातना की ओर पहुँचा दूँगा और वह बहुत-ही बुरा ठिकाना है!" (126)
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    और याद करो जब इबराहीम और इसमाईल इस घर की बुनियादें उठा रहे थे (तो उन्होंने प्रार्थना की), "ऐ हमारे रब! हमारी ओर से इसे स्वीकार कर ले, निस्संदेह तू सुनता-जानताहै। (127)
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    ऐ हमारे रब! हम दोनों को अपना आज्ञाकारी बना और हमारी संतान में से अपना एक आज्ञाकारी समुदाय बना और हमें हमारे इबादत के तरीक़े बता और हमारी तौबा क़बूल कर। निस्संदेह तू तौबा क़बूल करनेवाला, अत्यन्त दयावान है। (128 )
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    ऐ हमारे रब! उनमें उन्हीं में से एक ऐसा रसूल उठा जो उन्हें तेरी आयतें सुनाए और उनको किताब और तत्वदर्शिता की शिक्षा दे और उन (की आत्मा) को विकसित करे। निस्संदेह तू प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है।" (129)
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   कौन है जो इबराहीम के पंथ से मुँह मोड़े सिवाय उसके जिसने स्वयं को पतित कर लिया? और उसे तो हमने दुनिया में चुन लिया था और निस्संदेह आख़िरत में उसकी गणना योग्य लोगों में होगी। (130)
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    क्योंकि जब उससे उसके रब ने कहा, "मुस्लिम (आज्ञाकारी) हो जा।" उसने कहा, "मैं सारे संसार के रब का मुस्लिम हो गया।" (131)
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    और इसी की वसीयत इबराहीम ने अपने बेटों को की और याक़ूब ने भी (अपनी सन्तानों को की) कि, "ऐ मेरे बेटो! अल्लाह ने तुम्हारे लिए यही दीन (धर्म) चुना है, तो इस्लाम (ईश-आज्ञापालन) के अतिरिक्त किसी और दशा में तुम्हारी मृत्यु न हो।" (132)
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    (क्या तुम इबराहीम के वसीयत करते समय मौजूद थे?) या तुम मौजूद थे जब याक़ूब की मृत्यु का समय आया? जब उसने अपने बेटों से कहा, "तुम मेरे पश्चात किसकी इबादत करोगे?" उन्होंने कहा, "हम आपके इष्ट-पूज्य और आपके पूर्वज इबराहीम और इसमाईल और इसहाक़ के इष्ट-पूज्य की बन्दगी करेंगे - जो अकेला इष्ट-पूज्य है, और हम उसी के आज्ञाकारी (मुस्लिम) हैं।" (133)
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   वह एक गरोह था जो गुज़र चुका, जो कुछ उसने कमाया वह उसका है, और जो कुछ तुमने कमाया वह तुम्हारा है। और जो कुछ वे करते रहे उसके विषय में तुमसे कोई पूछताछ न की जाएगी। (134)
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    वे कहते हैं, "यहूदी या ईसाई हो जाओ तो मार्ग पा लोगे।" कहो, "नहीं, बल्कि इबराहीम का पंथ अपनाओ जो एक (अल्लाह) का हो गया था, और वह बहुदेववादियों में से न था।" (135)
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    कहो, "हम ईमान लाए अल्लाह पर और उस चीज़ पर जो हमारी ओर उतरी और जो इबराहीम और इसमाईलऔर इसहाक़ और याक़ूब और उनकी संतान की ओर उतरी, और जो मूसा और ईसा को मिली, और जो सभी नबियों को उनके रब की ओर से प्रदान की गई। हम उनमें से किसी (नबी) के बीच अन्तर नहीं करते और हम केवल उसी के आज्ञाकारी हैं।" (136)
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    फिर यदि वे उसी तरह ईमान लाएँ जिस तरह तुम ईमान लाए हो,तो उन्होंने मार्ग पा लिया। और यदि वे मुँह मोड़ें, तो फिर वही विरोध में पड़े हुए हैं। अतः तुम्हारी जगह स्वयं अल्लाह उनसे निबटने के लिए काफ़ी है; वह सब कुछ सुनता, जानता है। (137)
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    (कहो) "अल्लाह का रंग ग्रहणकरो, उसके रंग से अच्छा और किसका रंग हो सकता है? और हम तो उसी की बन्दगी करते हैं।"(138)
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  कहो, "क्या तुम अल्लाह के विषय में हमसे झगड़ते हो, हालाँकि वही हमारा रब भी है, और तुम्हारा रब भी? और हमारे लिए हमारे कर्म हैं और तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्म।और हम तो बस निरे उसी के हैं।(139)
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   या तुम कहते हो कि इबराहीम और इसमाईल और इसहाक़ और याक़ूब और उनकी संतान सब के सब यहूदी या ईसाई थे?" कहो,"तुम अधिक जानते हो या अल्लाह?और उससे बढ़कर ज़ालिम कौन होगा, जिसके पास अल्लाह की ओर से आई हुई कोई गवाही हो, और वह उसे छिपाए? और जो कुछ तुम कर रहे हो, अल्लाह उससे बेख़बर नहीं है।"(140)
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    वह एक गरोह था जो गुज़र चुका, जो कुछ उसने कमाया वह उसके लिए है और जो कुछ तुमने कमाया वह तुम्हारे लिए है। औरतुमसे उसके विषय में न पूछा जाएगा, जो कुछ वे करते रहे हैं।(141)
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    मूर्ख लोग अब कहेंगे,"उन्हें उनके उस क़िबले (उपासना-दिशा) से, जिस पर वे थेकिस ची़ज़ ने फेर दिया?" कहो,"पूरब और पश्चिम अल्लाह ही के हैं, वह जिसे चाहता है सीधा मार्ग दिखाता है।" (142)
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    और इसी प्रकार हमने तुम्हें बीच का एक उत्तम समुदाय बनाया है, ताकि तुम सारे मनुष्यों पर गवाह हो, और रसूल तुमपर गवाह हो ।और जिस (क़िबले) पर तुम रहे हो उसे तो हमने केवल इसलिए क़िबला बनाया था कि जो लोग पीठ-पीछे फिर जानेवाले हैं, उनसे हम उनको अलग जान लें जो रसूल का अनुसरण करते हैं। और यह बात बहुत भारी (अप्रिय) है, किन्तुउन लोगों के लिए नहीं जिन्हेंअल्लाह ने मार्ग दिखाया है। और अल्लाह ऐसा नहीं कि वह तुम्हारे ईमान को अकारथ कर दे, अल्लाह तो इनसानों के लिए अत्यन्त करुणामय, दयावान है। (143)
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   हम आकाश में तुम्हारे मुँहकी गर्दिश देख रहे हैं, तो हम अवश्य ही तुम्हें उसी क़िबले का अधिकारी बना देंगे जिसे तुम पसन्द करते हो। अतः मस्जिदे-हराम (काबा) की ओर अपना रुख़ करो। और जहाँ कहीं भी हो अपने मुँह उसी की ओर करो। निश्चय ही जिन लोगों को किताब मिली थी, वे भली-भाँति जानते हैं कि वही उनके रब की ओर से हक़ है, इसके बावजूद जो कुछ वे कर रहे हैं अल्लाह उससे बेख़बर नहीं है। (144)
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    यदि तुम उन लोगों के पास, जिन्हें किताब दी गई थी, कोई भी निशानी ले आओ, फिर भी वे तुम्हारे क़िबले का अनुसरण नहीं करेंगे और तुम भी उनके क़िबले का अनुसरण करने वाले नहीं हो। और वे स्वयं परस्पर एक-दूसरे के क़िबले का अनुसरणकरनेवाले नहीं हैं। और यदि तुमने उस ज्ञान के पश्चात, जो तुम्हारे पास आ चुका है, उनकी इच्छाओं का अनुसरण किया, तो निश्चय ही तुम्हारी गणना ज़ालिमों में होगी। (145)
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    जिन लोगों को हमने किताब दी है वे उसे पहचानते हैं, जैसे अपने बेटों को पहचानते हैं और उनमें से कुछ सत्य को जान-बूझकर छिपा रहे हैं। (146)
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  सत्य तुम्हारे रब की ओर से है, अतः तुम सन्देह करनेवालोंमें से कदापि न होना। (147)
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    प्रत्येक की एक ही दिशा है,वह उसी की ओर मुख किेए हुए है, तो तुम भलाइयों में अग्रसरता दिखाओ। जहाँ कहीं भी तुम होगेअल्लाह तुम सबको एकत्र करेगा। निस्संदेह अल्लाह को हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है। (148)
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    और जहाँ से भी तुम निकलो, 'मस्जिदे हराम' (काबा) की ओर अपना मुँह फेर लिया करो। निस्संदेह यही तुम्हारे रब की ओर से हक़ है। जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उससे बेख़बर नहीं है। (149)
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    जहाँ से भी तुम निकलो, 'मस्जिदे हराम' की ओर अपना मुँह फेर लिया करो, और जहाँ कहीं भी तुम हो उसी की ओर मुँहकर लिया करो, ताकि लोगों के पास तुम्हारे ख़िलाफ़ कोई ठोस प्रमाण बाक़ी न रहे - सिवाय उन लोगों के जो उनमें ज़ालिम हैं, तुम उनसे न डरो, मुझसे ही डरो - और ताकि मैं तुमपर अपनी नेमत पूरी कर दूँ, और ताकि तुम सीधी राह चलो। (150)
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    जैसाकि हमने तुम्हारे बीच एक रसूल तुम्हीं में से भेजा जो तुम्हें हमारी आयतें सुनाता है, तुम्हें निखारता है, और तुम्हें किताब और हिकमत (तत्वदर्शिता) की शिक्षा देता है और तुम्हें वहकुछ सिखाता है, जो तुम जानते नथे। (151)
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    अतः तुम मुझे याद रखो, मैं भी तुम्हें याद रखूँगा। और मेरा आभार स्वीकार करते रहना,मेरे प्रति अकृतज्ञता न दिखलाना।(152)
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   ऐ ईमान लानेवालो! धैर्य और नमाज़ से मदद प्राप्त करो। निस्संदेह अल्लाह उन लोगों के साथ है जो धैर्य और दृढ़ता से काम लेते हैं।(153)
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    और जो लोग अल्लाह के मार्ग में मारे जाएँ उन्हें मुर्दा न कहो, बल्कि वे जीवित हैं, परन्तु तुम्हें एहसास नहीं होता। (154)
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    और हम अवश्य ही कुछ भय से, और कुछ भूख से, और कुछ जान-माल और पैदावार की कमी से तुम्हारी परीक्षा लेंगे और धैर्य से काम लेनेवालों को शुभ-सूचना दे दो। (155)
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    जो लोग उस समय, जबकि उनपर कोई मुसीबत आती है, कहते हैं,"निस्संदेह हम अल्लाह ही के हैं और हम उसी की ओर लौटने वाले हैं।" (156)
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   यही लोग हैं जिनपर उनके रब की विशेष कृपाएँ हैं और दयालुता भी; और यही लोग हैं जोसीधे मार्ग पर हैं। (157)
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    निस्संदेह सफ़ा और मरवा अल्लाह की विशेष निशानियों में से हैं; अतः जो इस घर (काबा) का हज या उमरा करे, उसकेलिए इसमें कोई दोष नहीं कि वह इन दोनों (पहाड़ियों) के बीच फेरा लगाए। और जो कोई स्वेच्छा और रुचि से कोई भलाईका कार्य करे तो अल्लाह भी गुणग्राहक, सर्वज्ञ है। (158)
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   जो लोग हमारी उतारी हुई खुली निशानियों और मार्गदर्शन को छिपाते हैं इसके बाद कि हम उन्हें लोगों के लिए किताब में स्पष्ट कर चुके हैं; वही हैं जिन्हें अल्लाह धिक्कारता है - और सभी धिक्कारने वाले भी उन्हें धिक्कारते हैं।(159)
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   सिवाय उनके जिन्होंने तौबा कर ली और सुधार कर लिया, और साफ़-साफ़ बयान कर दिया, तोउनकी तौबा मैं क़बूल करूँगा; मैं बड़ा तौबा क़बूल करनेवाला, अत्यन्त दयावान हूँ। (160)
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    जिन लोगों ने कुफ़्र किया और काफ़िर (इनकार करनेवाले) ही रहकर मरे, वही हैं जिनपर अल्लाह की, फ़रिश्तों की और सारे मनुष्यों की, सबकी फिटकार है। (161)
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    इसी दशा में वे सदैव रहेंगे, न उनकी यातना हल्की की जाएगी और न उन्हें मुहलत ही मिलेगी। (162)
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    तुम्हारा पूज्य-प्रभु अकेला पूज्य-प्रभु है, उस कृपाशील और दयावान के अतिरिक्त कोई पूज्य-प्रभु नही। (163)
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   निस्संदेह आकाशों और धरती की संरचना में, और रात और दिन की अदला-बदली में, और उन नौकाओं में जो लोगों की लाभप्रद चीज़ें लेकर समुद्र (और नदी) में चलती हैं, और उस पानी में जिसे अल्लाह ने आकाशसे उतारा, फिर जिसके द्वारा धरती को उसके निर्जीव होने केपश्चात जीवित किया और उसमें हर एक (प्रकार के) जीवधारी को फैलाया और हवाओं को गर्दिश देने में और उन बादलों में जो आकाश और धरती के बीच (काम पर) नियुक्त होते हैं, उन लोगों के लिए कितनी ही निशानियाँ हैं जो बुद्धि से काम लें। (164)
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    कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अल्लाह से हटकर दूसरों को उसके समकक्ष ठहराते हैं, उनसेऐसा प्रेम करते हैं जैसा अल्लाह से प्रेम करना चाहिए। और जो ईमानवाले हैं उन्हें सबसे बढ़कर अल्लाह से प्रेम होता है। और ये अत्याचारी (बहुदेववादी) जबकि यातना देखते हैं, यदि इस तथ्य को जानलेते कि शक्ति सारी की सारी अल्लाह ही को प्राप्त है और यह कि अल्लाह अत्यन्त कठोर यातना देनेवाला है (तो इनकी नीति कुछ और होती)। (165)
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    जब वे लोग जिनके पीछे वे चलते थे, यातना को देखकर अपने अनुयायियों से विरक्त हो जाएँगे और उनके सम्बन्ध और सम्पर्क टूट जाएँगे। (166)
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    वे लोग जो उनके पीछे चले थेकहेंगे, "काश! हमें एक बार (फिरसंसार में लौटना होता तो जिस तरह आज ये हमसे विरक्त हो रहे हैं, हम भी इनसे विरक्त हो जाते।" इस प्रकार अल्लाह उनकेलिए संताप बनाकर उन्हें उनके कर्म दिखाएगा और वे आग (जहन्नम) से निकल न सकेंगे। (167)
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    ऐ लोगो! धरती में जो हलाल और अच्छी-सुथरी चीज़ें हैं उन्हें खाओ और शैतान के पदचिन्हों पर न चलो। निस्संदेह वह तुम्हारा खुला शत्रु है। (168)
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   वह तो बस तुम्हें बुराई और अश्लीलता पर उकसाता है और इसपर कि तुम अल्लाह पर थोपकर वे बातें कहो जो तुम नहीं जानते। (169)
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   और जब उनसे कहा जाता है,"अल्लाह ने जो कुछ उतारा है उसका अनुसरण करो।" तो कहते हैं, "नहीं बल्कि हम तो उसका अनुसरण करेंगे जिसपर हमने अपने बाप-दादा को पाया है।" क्या उस दशा में भी जबकि उनके बाप-दादा कुछ भी बुद्धि से काम न लेते रहे हों और न सीधे मार्ग पर रहे हों?(170)
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  इन इनकार करनेवालों की मिसाल ऐसी है जैसे कोई ऐसी बात को उच्चारित कर रहा है जो स्वयं उसे भी एक पुकार और आवाज़ के सिवा कुछ न सुनाई दे। ये बहरे हैं, गूँगें हैं, अन्धे हैं; इसलिए ये कुछ भी नहीं समझ सकते।(171)
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   ऐ ईमान लानेवालो! जो अच्छी-सुथरी चीज़ें हमने तुम्हें प्रदान की हैं उनमें से खाओ और अल्लाह के आगे कृतज्ञता दिखलाओ, यदि तुम उसी की बन्दगी करते हो। (172)
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   उसने तो तुमपर केवल मुर्दार और ख़ून और सूअर का माँस और जिस पर अल्लाह के अतिरिक्त किसी और का नाम लियागया हो, हराम ठहराया है। इसपर भी जो बहुत मजबूर और विवश हो जाए, वह अवज्ञा करनेवाला न हो और न सीमा से आगे बढ़नेवाला हो तो उसपर कोई गुनाह नहीं। निस्संदेह अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है। (173)
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    जो लोग उस चीज़ को छिपाते हैं जो अल्लाह ने अपनी किताब में से उतारी है और उसके बदले थोड़े मूल्य का सौदा करते हैं, वे तो बस आग खाकर अपने पेट भर रहे हैं; और क़ियामत केदिन अल्लाह न तो उनसे बात करेगा और न उन्हें निखारेगा; और उनके लिए दुखद यातना है। (174)
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   यही लोग हैं जिन्होंने मार्गदर्शन के बदले पथभ्रष्टता मोल ली; और क्षमा के बदले यातना के ग्राहक बने।तो आग को सहन करने के लिए उनकाउत्साह कितना बढ़ा हुआ है!(175)
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    वह (यातना) इसलिए होगी कि अल्लाह ने तो हक़ के साथ किताब उतारी, किन्तु जिन लोगों ने किताब के मामले में विभेद किया वे हठ और विरोध में बहुत दूर निकल गए। (176)
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   वफ़ादारी और नेकी केवल यह नहीं है कि तुम अपने मुँह पूरब और पश्चिम की ओर कर लो, बल्कि वफ़ादारी तो उसकी वफ़ादारी है जो अल्लाह अन्तिम दिन, फ़रिश्तों, किताब और नबियों पर ईमान लाया और माल, उसके प्रति प्रेम के बावजूद नातेदारों, अनाथों, मुहताजों,मुसाफ़िरों और माँगनेवालों को दिया और गर्दनें छुड़ाने में भी, और नमाज़ क़ायम की और ज़कात दी और अपने वचन को ऐसे लोग पूरा करनेवाले हैं जब वचनदें; और तंगी और विशेष रूप से शारीरिक कष्टों में और लड़ाई के समय में जमनेवाले हैं, ऐसे ही लोग हैं जो सच्चे सिद्ध हुए और यही लोग डर रखनेवाले हैं।(177)
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    ऐ ईमान लानेवालो! मारे जानेवालों के विषय में क़िसास (हत्यादंड) तुमपर अनिवार्य किया गया, स्वतंत्र-स्वतंत्र बराबर हैं और ग़़ुलाम-ग़ुलाम बराबर हैं और औरत-औरत बराबर हैं। फिर यदि किसी को उसके भाई की ओर से कुछछूट मिल जाए तो सामान्य रीति का पालन करना चाहिए; और भले तरीक़े से उसे अदा करना चाहिए।यह तुम्हारे रब की ओर से एक छूट और दयालुता है। फिर इसके बाद भी जो ज़्यादती करे तो उसके लिए दुखद यातना है। (178)
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  ऐ बुद्धि और समझवालो! तुम्हारे लिए क़िसास (हत्यादंड) में जीवन है, ताकि तुम बचो। (179)
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    जब तुममें से किसी की मृत्यु का समय आ जाए, यदि वह कुछ माल छोड़ रहा हो, तो माँ-बाप और नातेदारों को भलाईकी वसीयत करना तुमपर अनिवार्य किया गया। यह हक़ हैडर रखनेवालों पर। (180)
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   तो जो कोई उसके सुनने के पश्चात उसे बदल डाले तो उसका गुनाह उन्हीं लोगों पर होगा जो इसे बदलेंगे। निस्संदेह अल्लाह सब कुछ सुननेवाला और जाननेवाला है। (181)
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   फिर जिस किसी वसीयत करनेवाले को न्याय से किसी प्रकार के हटने या हक़़ मारनेकी आशंका हो, इस कारण उनके (वारिसों के) बीच सुधार की व्यवस्था कर दे, तो उसपर कोई गुनाह नहीं। निस्संदेह अल्लाह क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है।(182)
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   ऐ ईमान लानेवालो! तुमपर रोज़े अनिवार्य किए गए, जिस प्रकार तुमसे पहले के लोगों पर अनिवार्य किए गए थे, ताकि तुम डर रखनेवाले बन जाओ। (183)
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  गिनती के कुछ दिनों के लिए - इसपर भी तुममें कोई बीमार हो, या सफ़र में हो तो दूसरे दिनों में संख्या पूरी कर ले।और जिन (बीमार और मुसाफ़िरों) को इसकी (मुहताजों को खिलाने की) सामर्थ्य हो, उनके ज़िम्मे बदले में एक मुहताज का खाना है। फिर जो अपनी ख़ुशी से कुछ और नेकी करे तो यह उसी के लिए अच्छा है और यह कि तुम रोज़ा रखो तो तुम्हारेलिए अधिक उत्तम है, यदि तुम जानो। (184)
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   रमज़ान का महीना वह है जिसमें क़ुरआन उतारा गया लोगों के मार्गदर्शन के लिए, और मार्गदर्शन और सत्य-असत्य के अन्तर के प्रमाणों के साथ।अतः तुममें जो कोई इस महीने में मौजूद हो उसे चाहिए कि उसके रोज़े रखे और जो बीमार हो या सफ़र में हो तो दूसरे दिनों में गिनती पूरी कर ले। अल्लाह तुम्हारे साथ आसानी चाहता है, वह तुम्हारे साथ सख़्ती और कठिनाई नहीं चाहता,(वह तुम्हें हिदायत दे रहा है)और चाहता है कि तुम संख्या पूरी कर लो और जो सीधा मार्ग तुम्हें दिखाया गया है, उस पर अल्लाह की बड़ाई प्रकट करो औरताकि तुम कृतज्ञ बनो। (185)
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    और जब तुमसे मेरे बन्दे मेरे सम्बन्ध में पूछें, तो मैं तो निकट ही हूँ, पुकारने वाले की पुकार का उत्तर देता हूँ जब वह मुझे पुकारता है, तोउन्हें चाहिए कि वे मेरा हुक्म मानें और मुझपर ईमान रखें, ताकि वे सीधा मार्ग पा लें। (186)
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    तुम्हारे लिए रोज़ों की रातों में अपनी औरतों के पास जाना जायज़ (वैध) हुआ। वे तुम्हारे परिधान (लिबास) हैं और तुम उनका परिधान हो। अल्लाह को मालूम हो गया कि तुम लोग अपने-आप से कपट कर रहेथे, तो उसने तुमपर कृपा की और तुम्हें क्षमा कर दिया। तो अबतुम उनसे मिलो-जुलो और अल्लाहने जो कुछ तुम्हारे लिए लिख रखा है, उसे तलब करो। और खाओ और पियो यहाँ तक कि तुम्हें उषाकाल की सफ़ेद धारी (रात की)काली धारी से स्पष्ट दिखाई देजाए। फिर रात तक रोज़ा पूरा करो और जब तुम मस्जिदों में 'एतिकाफ़' की हालत में हो, तो तुम उनसे (पत्नियों से) न मिलो। ये अल्लाह की सीमाएँ हैं। अतः इनके निकट न जाना। इस प्रकार अल्लाह अपनी आयतें लोगों के लिए खोल-खोलकर बयान करता है, ताकि वे डर रखनेवाले बनें। (187)
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    और आपस में तुम एक-दूसरे केमाल को अवैध रूप से न खाओ, और नउन्हें हाकिमों के आगे ले जाओकि (हक़ मारकर) लोगों के कुछ माल जानते-बूझते हड़प सको। (188)
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    वे तुमसे (प्रतिष्ठित) महीनों के विषय में पूछते हैं। कहो, "वे तो लोगों के लिए और हज के लिए नियत हैं। और यह कोई ख़ूबी और नेकी नहीं है कि तुम घरों में उनके पीछे से आओ,बल्कि नेकी तो उसकी है जो (अल्लाह का) डर रखे। तुम घरों में उनके दरवाज़ों से आओ और अल्लाह से डरते रहो, ताकि तुम्हें सफलता प्राप्त हो। (189)
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   और अल्लाह के मार्ग में उन लोगों से लड़ो जो तुमसे लड़ें, किन्तु ज़्यादती न करो। निस्संदेह अल्लाह ज़्यादती करनेवालों को पसन्द नहीं करता। (190)
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    और जहाँ कहीं उनपर क़ाबू पाओ, क़त्ल करो और उन्हें निकालो जहाँ से उन्होंने तुम्हें निकाला है, इसलिए कि फ़ितना (उपद्रव) क़त्ल से भी बढ़कर गम्भीर है। लेकिन मस्जिदे-हराम (काबा) के निकट तुम उनसे न लड़ो जब तक कि वे स्वयं तुमसे वहाँ युद्ध न करें। अतः यदि वे तुमसे युद्धकरें तो उन्हें क़त्ल करो - ऐसे इनकारियों का ऐसा ही बदलाहै। (191)
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    फिर यदि वे बाज़ आ जाएँ तो अल्लाह भी क्षमा करनेवाला, अत्यन्त दयावान है। (192)
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    तुम उनसे लड़ो यहाँ तक कि फ़ितना शेष न रह जाए और दीन (धर्म) अल्लाह के लिए हो जाए। अतः यदि वे बाज़ आ जाएँ तो अत्याचारियों के अतिरिक्त किसी के विरुद्ध कोई क़दम उठाना ठीक नहीं।(193)
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    प्रतिष्ठित महीना बराबर है प्रतिष्ठित महिने के, और समस्त प्रतिष्ठाओं का भी बराबरी का बदला है। अतः जो तुमपर ज़्यादती करे, तो जैसी ज़्यादती वह तुम पर करे, तुम भी उसी प्रकार उससे ज़्यादती का बदला ले सकते हो। और अल्लाह का डर रखो और जान लो किअल्लाह डर रखनेवालों के साथ है। (194)
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    और अल्लाह के मार्ग में ख़र्च करो और अपने ही हाथों से अपने-आपको तबाही में न डालो, और अच्छे से अच्छा तरीक़ा अपनाओ। निस्संदेह अल्लाह अच्छे से अच्छा काम करनेवालों को पसन्द करता है। (195)
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   और हज और उमरा जो कि अल्लाह के लिए हैं, पूरे करो। फिर यदितुम घिर जाओ तो जो क़ुरबानी उपलब्ध हो पेश कर दो। और अपने सिर न मूँडो जब तक कि क़ुरबानी अपने ठिकाने पर न पहुँच जाए, किन्तु जो व्यक्तितुममें बीमार हो या उसके सिर में कोई तकलीफ़ हो तो रोज़े या सदक़ा या क़ुरबानी के रूप में फ़िदया देना होगा। फिर जबतुम पर से ख़तरा टल जाए, तो जो व्यक्ति हज तक उमरे से लाभान्वित हो, तो जो क़ुरबानीउपलब्ध हो पेश करे, और जिसको उपलब्ध न हो तो हज के दिनों में तीन दिन के रोज़े रखे और सात दिन के रोज़े जब तुम वापस हो, ये पूरे दस हुए। यह उसके लिए है जिसके बाल-बच्चे मस्जिदे-हराम के निकट न रहते हों। अल्लाह का डर रखो और भली-भाँति जान लो कि अल्लाह कठोर दंड देनेवाला है।(196)
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    हज के महीने जाने-पहचाने और निश्चित हैं, तो जो इनमें हज करने का निश्चय करे, तो हज में न तो काम-वासना की बातें हो सकती हैं और न अवज्ञा और न लड़ाई-झगड़े की कोई बात। और जो भलाई के काम भी तुम करोगे अल्लाह उसे जानता होगा। और (ईश-भय का) पाथेय ले लो, क्योंकि सबसे उत्तम पाथेय ईश-भय ही है। और ऐ बुद्धि और समझवालो! मेरा डर रखो।(197)
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   इसमें तुम्हारे लिए कोई गुनाह नहीं कि अपने रब का अनुग्रह तलब करो। फिर जब तुम अरफ़ात से चलो तो 'मशअरे-हराम'(मुज़दल्फ़ा) के निकट ठहरकर अल्लाह को याद करो, और उसे यादकरो जैसा कि उसने तुम्हें बताया है, और इससे पहले तुम पथभ्रष्ट थे।(198)
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   इसके पश्चात जहाँ से और सब लोग चलें, वहीं से तुम भी चलो, और अल्लाह से क्षमा की प्रार्थना करो। निस्संदेह अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है। (199)
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   फिर जब तुम अपनी हज सम्बन्धी रीतियों को पूरा कर चुको तो अल्लाह को याद करो जैसे अपने बाप-दादा को याद करते रहे हो, बल्कि उससे भी बढ़कर याद करो। फिर लोगों मेंकोई तो ऐसा है जो कहता है,"हमारे रब! हमें दुनिया ही में दे दे।" ऐसी हालत में आख़िरत में उसका कोई हिस्सा नहीं। (200)
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