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7. अल-आराफ़    [ कुल आयतें - 206 ]

सुरु अल्लाह के नाम से जो बड़ा कृपाशील अत्यन्त दयावान है।  
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4. अन-निसा [ कुल आयतें - 176 ]

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3 आले-इमरान    [ कुल आयतें - 200 ]

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2 अल-बक़रा    [ कुल आयतें - 286 ]

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2.3 अल-बक़रा    [ कुल आयतें - 286 ]

सुरु अल्लाह के नाम से
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   और उनमें कोई ऐसा है जो कहता है, "हमारे रब! हमें प्रदान कर दुनिया में भी अच्छी दशा और आख़िरत में भी अच्छी दशा, और हमें आग (जहन्नम) की यातना से बचा ले।" (201)
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   ऐसे ही लोग हैं कि उन्होंने जो कुछ कमाया है उसका हिस्सा उनके लिए नियत है। और अल्लाह जल्द ही हिसाब चुकानेवाला है।(202)
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   और अल्लाह की याद में गिनती के ये कुछ दिन व्यतीत करो। फिर जो कोई जल्दी करके दो ही दिन में कूच करे तो इसमें उसपर कोई गुनाह नहीं। और जो ठहरा रहे तो इसमें भी उसपर कोई गुनाह नहीं। यह उसकेलिेए है जो अल्लाह का डर रखे। और अल्लाह का डर रखो और जान रखो कि उसी के पास तुम इकट्ठा होगे। (203)
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    लोगों में कोई तो ऐसा है किइस सांसारिक जीवन के विषय मेंउसकी बात तुम्हें बहुत भाती है, उस (खोट) के बावजूद जो उसकेदिल में होती है, वह अल्लाह कोगवाह ठहराता है और झगड़े में वह बड़ा हठी है। (204)
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    और जब वह लौटता है तो धरती में इसलिए दौड़-धूप करता है कि इसमें बिगाड़ पैदा करे और खेती और नस्ल को तबाह करे, जबकि अल्लाह बिगाड़ को पसन्द नहीं करता। (205)
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    और जब उससे कहा जाता है,"अल्लाह से डर", तो अहंकार उसे और गुनाह पर जमा देता है। अतः उसके लिए तो जहन्नम ही काफ़ी है, और वह बहुत-ही बुरा ठिकानाहै। (206)
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    और लोगों में वह भी है जो अल्लाह की प्रसन्नता के संसाधन की चाह में अपनी जान खपा देता है। अल्लाह भी अपने ऐसे बन्दों के प्रति अत्यन्त करुणाशील है। (207)
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  ऐ ईमान लानेवालो! तुम सब सुलह और शान्ति में दाख़िल होजाओ और शैतान के पदचिन्हों परन चलो। वह तो तुम्हारा खुला हुआ शत्रु है। (208)
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    फिर यदि तुम उन स्पष्ट दलीलों के पश्चात भी, जो तुम्हारे पास आ चुकी हैं, फिसल गए, तो भली-भाँति जान रखोकि अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है।(209)
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    क्या वे (इसराईल की सन्तान)बस इसकी प्रतीक्षा कर रहे हैंकि अल्लाह स्वयं बादलों की छायों में उनके सामने आ जाए और फ़रिश्ते भी, हालाँकि बात तय कर दी गई है? मामले तो अल्लाह ही की ओर लौटते हैं। (210)
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    इसराईल की सन्तान से पूछो, हमने उन्हें कितनी खुली-खुली निशानियाँ प्रदान कीं। और जो अल्लाह की नेमत को इसके बाद कि वह उसे पहुँच चुकी हो, बदल डाले, तो निस्संदेह अल्लाह भीकठोर दंड देनेवाला है। (211)
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    इनकार करनेवाले सांसारिक जीवन पर रीझे हुए हैं और ईमानवालों का उपहास करते हैं,जबकि जो लोग अल्लाह का डर रखते हैं, वे क़ियामत के दिन उनसे ऊपर होंगे। अल्लाह जिसे चाहता है बेहिसाब देता है। (212)
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    सारे मनुष्य एक ही समुदाय हैं (उन्होंने विभेद किया) तो अल्लाह ने नबियों को भेजा, जो शुभ-सूचना देनेवाले और डरानेवाले थे; और उनके साथ हक़ पर आधारित किताब उतारी, ताकि लोगों में उन बातों का जिनमें वे विभेद कर रहे हैं, फ़ैसला कर दे। इसमें विभेद तोबस उन्हीं लोगों ने, जिन्हें वह मिली थी, परस्पर ज़्यादती करने के लिए इसके पश्चात किया, जबकि खुली निशानियाँ उनके पास आ चुकी थीं। अतः ईमानवालों का अल्लाह ने अपनी अनुज्ञा से उस सत्य के विषय में मार्गदर्शन किया, जिसमें उन्होंने विभेद किया था। अल्लाह जिसे चाहता है, सीधे मार्ग पर चलाता है। (213)
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    क्या (तुम सीधे रास्ते पर जमे रहोगे या) तुमने यह समझ रखा है कि जन्नत में प्रवेश पा जाओगे, जबकि अभी तुम पर वह सब कुछ नहीं बीता है जो तुमसे पहले के लोगों पर बीत चुका? उनपर तंगियाँ और तकलीफ़ें आईं और उन्हें हिला मारा गया, यहाँ तक कि रसूल और उसके साथ ईमानवाले भी बोल उठे कि अल्लाह की सहायता कब आएगी? जान लो! अल्लाह की सहायता निकट है। (214)
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    वे तुमसे पूछते हैं,"कितना ख़र्च करें?" कहो,"(पहले यह समझ लो कि) जो माल भी तुमने ख़र्च किया है, वह तो माँ-बाप, नातेदारों और अनाथोंऔर मुहताजों और मुसाफ़िरों के लिए ख़र्च हुआ है। और जो भलाई भी तुम करो, निस्संदेह अल्लाह उसे भली-भाँति जान लेगा। (215)
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    तुम पर युद्ध अनिवार्य किया गया और वह तुम्हें अप्रिय है, और बहुत सम्भव है कि कोई चीज़ तुम्हें अप्रिय हो और वह तुम्हारे लिए अच्छी हो। और बहुत सम्भव है कि कोई चीज़ तुम्हें प्रिय हो और वह तुम्हारे लिए बुरी हो। और जानता अल्लाह है, और तुम नहीं जानते।" (216)
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    वे तुमसे आदरणीय महीने मेंयुद्ध के विषय में पूछते हैं।कहो, "उसमें लड़ना बड़ी गम्भीर बात है, परन्तु अल्लाहके मार्ग से रोकना, उसके साथ अविश्वास करना, मस्जिदे-हराम (काबा) से रोकना और उसके लोगोंको उससे निकालना, अल्लाह की नज़र में इससे भी अधिक गम्भीर है और फ़ितना (उपद्रव), रक्तपात से भी बुरा है।" और उनका बस चले तो वे तो तुमसे बराबर लड़ते रहें, ताकि तुम्हें तुम्हारे दीन (धर्म) से फेर दें। और तुममें से जो कोई अपने दीन से फिर जाए और अविश्वासी होकर मरे, तो ऐसे ही लोग हैं जिनके कर्म दुनियाऔर आख़िरत में वबाल और आपदा हैं और वही आग (जहन्नम) में पड़नेवाले हैं, वे उसी में सदैव रहेंगे। (217)
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    रहे वे लोग जो ईमान लाए और जिन्होंने हिजरत की और (अल्लाह के मार्ग में घर-बार छोड़ा) और जिहाद किया, वही अल्लाह की दयालुता की आशा रखते हैं। निस्संदेह अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है। (218)
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    तुमसे शराब और जुए के विषय में पूछते हैं। कहो, "उन दोनोंचीज़ों में बड़ा गुनाह है, यद्यपि लोगों के लिए कुछ फ़ायदे भी हैं, परन्तु उनका गुनाह उनके फ़ायदे से कहीं बढ़कर है।" और वे तुमसे पूछते हैं, "कितना ख़र्च करें?" कहो,"जो आवश्यकता से अधिक हो।" इस प्रकार अल्लाह दुनिया और आख़िरत के विषय में तुम्हारे लिए अपनी आयतें खोल-खोलकर बयान करता है, ताकि तुम सोच-विचार करो। (219)
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    और वे तुमसे अनाथों के विषय में पूछते हैं। कहो,"उनके सुधार की जो रीति अपनाई जाए अच्छी है। और यदि तुम उन्हें अपने साथ सम्मिलित कर लो तो वे तुम्हारे भाई-बन्धु ही हैं। और अल्लाह बिगाड़ पैदा करनेवाले को बनाव पैदा करनेवाले से अलग पहचानता है। और यदि अल्लाह चाहता तो तुमकोज़हमत (कठिनाई) में डाल देता। निस्संदेह अल्लाह प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है।" (220)
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  और मुशरिक (बहुदेववादी) स्त्रियों से विवाह न करो जब तक कि वे ईमान न लाएँ। एक ईमानवाली बांदी (दासी), मुशरिक स्त्री से कहीं उत्तम है; चाहे वह तुम्हें कितनी ही अच्छी क्यों न लगे। और न (ईमानवाली स्त्रियों का) मुशरिक पुरुषों से विवाह करो,जब तक कि वे ईमान न लाएँ। एक ईमानवाला ग़ुलाम आज़ाद मुशरिकसे कहीं उत्तम है, चाहे वह तुम्हें कितना ही अच्छा क्यों न लगे। ऐसे लोग आग (जहन्नम) की ओर बुलाते हैं और अल्लाह अपनी अनुज्ञा से जन्नत और क्षमा की ओर बुलाता है। और वह अपनी आयतें लोगों के सामने खोल-खोलकर बयान करताहै, ताकि वे चेतें।(221)
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   और वे तुमसे मासिक-धर्म के विषय में पूछते हैं। कहो, "वह एक तकलीफ़ और गन्दगी की चीज़ है। अतः मासिक-धर्म के दिनों में स्त्रियों से अलग रहो और उनके पास न जाओ, जबतक कि वे पाक-साफ़ न हो जाएँ। फिर जब वेभली-भाँति पाक-साफ़ हो जाएँ, तो जिस प्रकार अल्लाह ने तुम्हें बताया है, उनके पास आओ। निस्संदेह अल्लाह बहुत तौबा करनेवालों को पसन्द करता है और वह उन्हें पसन्द करता है जो स्वच्छता को पसन्दकरते हैं।(222)
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   तुम्हारी स्त्रियाँ तुम्हारी खेती हैं। अतः जिस प्रकार चाहो तुम अपनी खेती में आओ और अपने लिए आगे भेजो; और अल्लाह से डरते रहो; भली-भाँति जान लो कि तुम्हें उससे मिलना है; और ईमान लानेवालों को शुभ-सूचना दे दो। (223)
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    अपने नेक और धर्मपरायण होने और लोगों के मध्य सुधारकहोने के सिलसिले में अपनी क़समों के द्वारा अल्लाह को आड़ और निशाना न बनाओ कि इन कामों को छोड़ दो। अल्लाह सब कुछ सुनता, जानता है। (224)
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    अल्लाह तुम्हें तुम्हारी ऐसी क़समों पर नहीं पकड़ेगा जोयूँ ही मुँह से निकल गई हों, लेकिन उन क़समों पर वह तुम्हें अवश्य पकड़ेगा जो तुम्हारे दिल के इरादे का नतीजा हों। अल्लाह बहुत क्षमा करनेवाला, सहनशील है। (225)
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    जो लोग अपनी स्त्रियों से अलग रहने की क़सम खा बैठें, उनके लिए चार महीने की प्रतीक्षा है। फिर यदि वे पलटआएँ, तो अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है। (226)
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   और यदि वे तलाक़ ही की ठान लें, तो अल्लाह भी सुननेवाला भली-भाँति जाननेवाला है। (227)
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    और तलाक़ पाई हुई स्त्रियाँ तीन हैज़ (मासिक-धर्म) गुज़रने तक अपने-आप को रोके रखें, और यदि वे अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान रखती हैं तो उनके लिए यह वैध न होगाकि अल्लाह ने उनके गर्भाशयों में जो कुछ पैदा किया हो उसे छिपाएँ। इस बीच उनके पति, यदि सम्बन्धों को ठीक कर लेने का इरादा रखते हों, तो वे उन्हें लौटा लेने के ज़्यादा हक़दार हैं। और उन पत्नियों के भी सामान्य नियम के अनुसार वैसे ही अधिकार हैं, जैसी उन पर ज़िम्मेदारियाँ डाली गई हैं।और पतियों को उनपर एक दर्जा प्राप्त है। अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है।(228)
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    तलाक़ दो बार है। फिर सामान्य नियम के अनुसार (स्त्री को) रोक लिया जाए या भले तरीक़े से विदा कर दिया जाए। और तुम्हारे लिए वैध नहीं है कि जो कुछ तुम उन्हें दे चुके हो, उसमें से कुछ ले लो, सिवाय इस स्थिति के कि दोनों को डर हो कि वे अल्लाह की (निर्धारित) सीमाओं पर क़ायम न रह सकेंगे तो यदि तुमको यह डर हो कि वे अल्लाह की सीमाओं पर क़ायम न रहेंगे तो स्त्री जो कुछ देकर छुटकारा प्राप्त करना चाहे उसमें उन दोनो के लिए कोई गुनाह नहीं। ये अल्लाह की सीमाएँ हैं। अतः इनका उल्लंघन न करो। और जो कोई अल्लाह की सीमाओं का उल्लंघन करे तो ऐसे लोग अत्याचारी हैं। (229)
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    (दो तलाक़ों के पश्चात) फिर यदि वह उसे तलाक़ दे दे, तो इसके पश्चात वह उसके लिए वैध न होगी, जब तक कि वह उसके अतिरिक्त किसी दूसरे पति से निकाह न कर ले। अतः यदि वह उसेतलाक़ दे दे तो फिर उन दोनों के लिए एक-दूसरे की ओर पलट आनेमें कोई गुनाह न होगा, यदि वे समझते हों कि अल्लाह की सीमाओं पर क़ायम रह सकते हैं।ये अल्लाह कि निर्धारित की हुई सीमाएँ हैं, जिन्हें वह उन लोगों के लिए बयान कर रहा है जो जानना चाहते हों। (230)
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    और जब तुम स्त्रियों को तलाक़ दे दो और वे अपनी निश्चित अवधि (इद्दत) को पहुँच जाएँ, तो सामान्य नियम के अनुसार उन्हें रोक लो या सामान्य नियम के अनुसार उन्हें विदा कर दो। और तुम उन्हें नुक़सान पहुँचाने के ध्येय से न रोको कि ज़्यादती करो। और जो ऐसा करेगा, तो उसनेस्वयं अपने ही ऊपर ज़ुल्म किया। और अल्लाह की आयतों को परिहास का विषय न बनाओ, और अल्लाह की कृपा जो तुम पर हुई है उसे याद रखो और उस किताब औरहिकमत (तत्वदर्शिता) को याद रखो जो उसने तुम पर उतारी है, जिसके द्वारा वह तुम्हें नसीहत करता है। और अल्लाह का डर रखो और भली-भाँति जान लो किअल्लाह हर चीज़ को जाननेवाला है। (231)
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    और जब तुम स्त्रियों को तलाक़ दे दो और वे अपनी निर्धारित अवधि (इद्दत) को पहुँच जाएँ तो उन्हें अपने होनेवाले दूसरे पतियों से विवाह करने से न रोको, जबकि वेसामान्य नियम के अनुसार परस्पर रज़ामन्दी से मामला तय करें। यह नसीहत तुममें से उसको की जा रही है जो अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान रखता है। यही तुम्हारे लिए ज़्यादा बरकतवाला और सुथरा तरीक़ा है। और अल्लाह जानता है, तुम नहीं जानते। (232)
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    और जो कोई पूरी अवधि तक (बच्चे को) दूध पिलवाना चाहे तो माएँ अपने बच्चों को पूरे दो वर्ष तक दूध पिलाएँ। और वह जिसका बच्चा है, सामान्य नियमके अनुसार उनके खाने और उनके कपड़े का ज़िम्मेदार है। किसी पर बस उसकी अपनी समाई भर ही ज़िम्मेदारी है, न तो कोई माँ अपने बच्चे के कारण (बच्चे के बाप को) नुक़सान पहुँचाए और न बाप अपने बच्चे के कारण (बच्चे की माँ को) नुक़सान पहुँचाए। और इसी प्रकार की ज़िम्मेदारी उसके वारिस पर भी आती है। फिर यदि दोनों पारस्परिक स्वेच्छा औरपरामर्श से दूध छुड़ाना चाहें तो उनपर कोई गुनाह नहीं। और यदि तुम अपनी संतान को किसी अन्य स्त्री से दूध पिलवाना चाहो तो इसमें भी तुमपर कोई गुनाह नहीं, जबकि तुमने जो कुछ बदले में देने का वादा किया हो सामान्य नियमके अनुसार उसे चुका दो। और अल्लाह का डर रखो और भली-भाँति जान लो कि जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसे देख रहा है। (233)
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    और तुममें से जो लोग मर जाएँ और अपने पीछे पत्नियाँ छोड़ जाएँ, तो वे पत्नियाँ अपने-आपको चार महीने और दस दिन तक रोके रखें। फिर जब वे अपनी निर्धारित अवधि (इद्दत) को पहुँच जाएँ, तो सामान्य नियम के अनुसार वे अपने लिए जो कुछ करें, उसमें तुमपर कोई गुनाह नहीं। जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसकी ख़बर रखता है (234)
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    और इसमें भी तुम पर कोई गुनाह नहीं कि तुम उन औरतों को विवाह के सन्देश सांकेतिक रूप से दो या अपने मन में छिपाए रखो। अल्लाह जानता है कि तुम उन्हें याद करोगे, परन्तु छिपकर उन्हें वचन न देना, सिवाय इसके कि सामान्य नियम के अनुसार कोई बात कह दो। और जब तक निर्धारित अवधि (इद्दत) पूरी न हो जाए, विवाह का नाता जोड़ने का निश्चय न करो। जान रखो कि अल्लाह तुम्हारे मन की बात भी जानता है। अतः उससे सावधान रहो और यह भी जान लो कि अल्लाह अत्यन्त क्षमा करनेवाला, सहनशील है। (235)
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    यदि तुम स्त्रियों को इस स्थिति मे तलाक़ दे दो कि यह नौबत पेश न आई हो कि तुमने उन्हें हाथ लगाया हो और उनका कुछ हक़ (मह्र) निश्चित किया हो, तो तुमपर कोई भार नहीं। हाँ, सामान्य नियम के अनुसार उन्हें कुछ ख़र्च दो - समाई रखनेवाले पर उसकी अपनी हैसियत के अनुसार और तंगदस्त पर उसकी अपनी हैसियत के अनुसार अनिवार्य है - यह अच्छे लोगों पर एक हक़ है। (236)
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   और यदि तुम उन्हें हाथ लगाने से पहले तलाक़ दे दो, किन्तु उसका मह्र निश्चित कर चुके हो, तो जो मह्र तुमने निश्चित किया है उसका आधा अदाकरना होगा, यह और बात है कि वे स्वयं छोड़ दें या पुरुष जिसके हाथ में विवाह का सूत्रहै, वह नर्मी से काम ले (और मह्र पूरा अदा कर दे)। और यह कि तुम नर्मी से काम लो तो यह परहेज़गारी से ज़्यादा क़रीबहै और तुम एक-दूसरे को हक़ से बढ़कर देना न भूलो। निश्चय हीअल्लाह उसे देख रहा है, जो कुछतुम करते हो।(237)
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   सदैव नमाज़ों की और अच्छी नमाज़ की पाबन्दी करो, और अल्लाह के आगे पूरे विनीत और शान्तभाव से खड़े हुआ करो।(238)
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    फिर यदि तुम्हें (शत्रु आदि का) भय हो, तो पैदल या सवारजिस तरह सम्भव हो नमाज़ पढ़ लो। फिर जब निश्चिन्त हो तो अल्लाह को उस प्रकार याद करो जैसा कि उसने तुम्हें सिखाया है, जिसे तुम नहीं जानते थे। (239)
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   और तुममें से जिन लोगों की मृत्यु हो जाए और अपने पीछे पत्नियाँ छोड़ जाएँ, अर्थात अपनी पत्नियों के हक़ में यह वसीयत छोड़ जाएँ कि घर से निकाले बिना एक वर्ष तक उन्हें ख़र्च दिया जाए, तो यदि वे निकल जाएँ तो अपने लिए सामान्य नियम के अनुसार वे जोकुछ भी करें उसमें तुम्हारे लिए कोई दोष नहीं। अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है।(240)
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   और तलाक़ पाई हुई स्त्रियों को सामान्य नियम के अनुसार (इद्दत की अवधि में)ख़र्च भी मिलना चाहिए। यह डर रखनेवालों पर एक हक़ है।(241)
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   इस प्रकार अल्लाह तुम्हारे लिए अपनी आयतें खोलकर बयान करता है, ताकि तुम समझ से काम लो। (242)
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    क्या तुमने उन लोगों को नहीं देखा जो हज़ारों की संख्या में होने पर भी मृत्युके भय से अपने घर-बार छोड़कर निकले थे? तो अल्लाह ने उनसे कहा, "मृत्यु प्राय हो जाओ तुम।" फिर उसने उन्हें जीवन प्रदान किया। अल्लाह तो लोगों के लिए उदार अनुग्राही है, किन्तु अधिकतर लोग कृतज्ञता नहीं दिखलाते। (243)
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     और अल्लाह के मार्ग में युद्ध करो और जान लो कि अल्लाह सब कुछ सुननेवाला, जाननेवाले है। (244)
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    कौन है जो अल्लाह को अच्छा ऋण दे कि अल्लाह उसे उसके लिए कई गुना बढ़ा दे? और अल्लाह हीतंगी भी देता है और कुशादगी भी प्रदान करता है, और उसी की ओर तुम्हें लौटना है। (245)
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    क्या तुमने मूसा के पश्चातइसराईल की सन्तान के सरदारों को नहीं देखा, जब उन्होंने अपने एक नबी से कहा, "हमारे लिए एक सम्राट नियुक्त कर दो ताकि हम अल्लाह के मार्ग में युद्ध करें?" उसने कहा, "यदि तुम्हें लड़ाई का आदेश दिया जाए तो क्या तुम्हारे बारे में यह सम्भावना नहीं है कि तुम न लड़ो?" वे कहने लगे, "हम अल्लाह के मार्ग में क्यों न लड़ें, जबकि हम अपने घरों से निकाल दिए गए हैं और अपने बाल-बच्चों से भी अलग कर दिए गए हैं?" - फिर जब उनपर युद्ध अनिवार्य कर दिया गया तो उनमें से थोड़े लोगों के सिवासब फिर गए। और अल्लाह ज़ालिमों को भली-भाँति जानता है। - (246)
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    उनके नबी ने उनसे कहा,"अल्लाह ने तुम्हारे लिए तालूत को सम्राट नियुक्त किया है।" बोले, "उसकी बादशाही हम पर कैसे हो सकती है, जबकि हम उसके मुक़ाबले में बादशाही के ज़्यादा हक़दार हैं और जबकि उसे माल की कुशादगी भी प्राप्त नहीं है?" उसने कहा, "अल्लाह ने तुम्हारे मुक़ाबले में उसको ही चुना है और उसे ज्ञान में और शारीरिक क्षमता में ज़्यादा कुशादगी प्रदान की है। अल्लाह जिसको चाहे अपना राज्य प्रदान करे। और अल्लाह बड़ी समाईवाला, सर्वज्ञ है।" (247)
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    उनके नबी ने उनसे कहा,"उसकी बादशाही की निशानी यह हैकि वह संदूक़ तुम्हारे पास आ जाएगा, जिसमें तुम्हारे रब कीओर से सकीनत (प्रशान्ति) और मूसा के लोगों और हारून के लोगों की छोड़ी हुई यादगारें हैं, जिसको फ़रिश्ते उठाए हुएहोंगे। यदि तुम ईमानवाले हो तो निस्संदेह इसमें तुम्हारेलिए बड़ी निशानी है।" (248)
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    फिर जब तालूत सेनाएँ लेकर चला तो उसने कहा, "अल्लाह निश्चित रूप से एक नदी द्वारातुम्हारी परीक्षा लेनेवाला है। तो जिसने उसका पानी पी लिया, वह मुझमें से नहीं है औरजिसने उसको नहीं चखा, वही मुझमें से है। यह और बात है किकोई अपने हाथ से एक चुल्लू भर ले ले।" फिर उनमें से थोड़े लोगों के सिवा सभी ने उसका पानी पी लिया। फिर जब तालूत और ईमानवाले जो उसके साथ थे नदी पार कर गए तो कहने लगे, "आजहममें जालूत और उसकी सेनाओं का मुक़ाबला करने की शक्ति नहीं है।" इस पर उन लोगों ने, जो समझते थे कि उन्हें अल्लाहसे मिलना है, कहा, "कितनी ही बार एक छोटी-सी टुकड़ी ने अल्लाह की अनुज्ञा से एक बड़ेगरोह पर विजय पाई है। अल्लाह तो जमने वालों के साथ है।" (249)
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    और जब वे जालूत और उसकी सेनाओं के मुक़ाबले पर आए तो कहा, "ऐ हमारे रब! हमपर धैर्य उंडेल दे और हमारे क़दम जमा दे और इनकार करनेवाले लोगों पर हमें विजय प्रदान कर।" (250)
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   अन्ततः अल्लाह की अनुज्ञा से उन्होंने उनको पराजित कर दिया और दाऊद ने जालूत को क़त्ल कर दिया, और अल्लाह ने उसे राज्य और तत्वदर्शिता (हिकमत) प्रदान की, जो कुछ वह (दाऊद) चाहे, उससे उसको अवगत कराया। और यदि अल्लाह मनुष्यों के एक गरोह को दूसरेगरोह के द्वारा हटाता न रहता तो धरती की व्यवस्था बिगड़ जाती, किन्तु अल्लाह संसारवालों के लिए उदार अनुग्राही है। (251)
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    ये अल्लाह की सच्ची आयतें हैं जो हम तुम्हें (सोद्देश्य) सुना रहे हैं और निश्चय ही तुम उन लोगों में से हो, जो रसूल बनाकर भेजे गए हैं। (252)
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    ये रसूल ऐसे हुए हैं कि इनमें हमने कुछ को कुछ पर श्रेष्ठता प्रदान की। इनमें कुछ से तो अल्लाह ने बातचीत की और इनमें से कुछ को दर्जों के एतिबार से उच्चता प्रदान की। और मरयम के बेटे ईसा को हमने खुली निशानियाँ दीं और पवित्र आत्मा से उसकी सहायता की। और यदि अल्लाह चाहता तो वे लोग, जो उनके पश्चात हुए, खुली निशानियाँ पा लेने के बाद परस्पर न लड़ते। किन्तु वे विभेद में पड़ गए तो उनमें से कोई तो ईमान लाया और उनमें से किसी ने इनकार की नीति अपनाई। और यदि अल्लाह चाहता तो वे परस्पर न लड़ते, परन्तु अल्लाह जो चाहता है, करता है। (253)
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   ऐ ईमान लानेवालो! हमने जो कुछ तुम्हें प्रदान किया है उसमें से (नेक कामों में) ख़र्च करो, इससे पहले कि वह दिन आ जाए जिसमें न कोई क्रय-विक्रय होगा और न कोई मित्रता होगी और न कोई सिफ़ारिश। ज़ालिम वही हैं, जिन्होंने इनकार की नीति अपनाई है।(254)
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    अल्लाह कि जिसके सिवा कोई पूज्य-प्रभु नहीं, वह जीवन्त-सत्ता है, सबको सँभालने और क़ायम रखनेवाला है। उसे न ऊँघलगती है और न निद्रा। उसी का है जो कुछ आकाशों में है और जोकुछ धरती में है। कौन है जो उसके यहाँ उसकी अनुमति के बिना सिफ़ारिश कर सके? वह जानता है जो कुछ उनके आगे है और जो कुछ उनके पीछे है। और वेउसके ज्ञान में से किसी चीज़ पर हावी नहीं हो सकते, सिवाय उसके जो उसने चाहा। उसकी कुर्सी (प्रभुता) आकाशों और धरती को व्याप्त है और उनकी सुरक्षा उसके लिए तनिक भी भारी नहीं और वह उच्च, महान है। (255)
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    धर्म के विषय में कोई ज़बरदस्ती नहीं। सही बात नासमझी की बात से अलग होकर स्पष्ट हो गई है। तो अब जो कोईबढ़े हुए सरकश को ठुकरा दे और अल्लाह पर ईमान लाए, उसने ऐसा मज़बूत सहारा थाम लिया जो कभीटूटनेवाला नहीं। अल्लाह सब कुछ सुनने, जाननेवाला है। (256)
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   जो लोग ईमान लाते हैं, अल्लाह उनका रक्षक और सहायक है। वह उन्हें अँधेरों से निकालकर प्रकाश की ओर ले जाताहै। रहे वे लोग जिन्होंने इनकार किया तो उनके संरक्षक बढ़े हुए सरकश हैं। वे उन्हेंप्रकाश से निकालकर अँधेरों की ओर ले जाते हैं। वही आग (जहन्नम) में पड़नेवाले हैं। वे उसी में सदैव रहेंगे।(257)
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   क्या तुमने उसको नहीं देखा, जिसने इबराहीम से उसके 'रब' के सिलसिले में झगड़ा किया था, इस कारण कि अल्लाह नेउसको राज्य दे रखा था? जब इबराहीम ने कहा, "मेरा 'रब' वह है जो जिलाता और मारता है।" उसने कहा, "मैं भी तो जिलाता और मारता हूँ।" इबराहीम ने कहा, "अच्छा तो अल्लाह सूर्य को पूरब से लाता है, तो तू उसे पश्चिम से ले आ।" इसपर वह अधर्मी चकित रह गया। अल्लाह ज़ालिम लोगों को सीधा मार्ग नहीं दिखाता। (258)
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    या उस जैसे (व्यक्ति) को नहीं देखा, जिसका एक ऐसी बस्ती पर से गुज़र हुआ, जो अपनी छतों के बल गिरी हुई थी। उसने कहा, "अल्लाह इसके विनष्ट हो जाने के पश्चात इसेकिस प्रकार जीवन प्रदान करेगा?" तो अल्लाह ने उसे सौ वर्ष की मृत्यु दे दी, फिर उसेउठा खड़ा किया। कहा, "तू कितनीअवधि तक इस अवस्था में रहा।" उसने कहा, "मैं एक दिन या दिन का कुछ हिस्सा रहा।" कहा,"नहीं, बल्कि तू सौ वर्ष रहा है। अब अपने खाने और पीने की चीज़ों को देख ले, उन पर समय का कोई प्रभाव नहीं, और अपने गधे को भी देख, और यह इसलिए कह रहे हैं ताकि हम तुझे लोगों के लिए एक निशानी बना दें और हड्डियों को देख कि किस प्रकार हम उन्हें उभारते हैं,फिर उनपर मांस चढ़ाते हैं।" तो जब वास्तविकता उस पर प्रकटहो गई तो वह पुकार उठा, "मैं जानता हूँ कि अल्लाह को हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है।"(259)
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    और याद करो जब इबराहीम ने कहा, "ऐ मेरे रब! मुझे दिखा दे, तू मुर्दों को कैसे जीवित करेगा?" (रब ने) कहा," क्या तुझे विश्वास नहीं?" उसने कहा, "क्यों नहीं, किन्तु यह निवेदन इसलिए है कि मेरा दिल संतुष्ट हो जाए।" (रब ने) कहा,"अच्छा, तो चार पक्षी ले, फिर उन्हें अपने साथ भली-भाँति हिला-मिला ले, फिर उनमें से प्रत्येक को एक-एक पर्वत पर रख दे, फिर उनको पुकार, वे तेरे पास लपककर आएँगे। और जानले कि अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है।" (260)
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   जो लोग अपने माल अल्लाह के मार्ग में ख़र्च करते हैं, उनकी उपमा ऐसी है, जैसे एक दाना हो, जिससे सात बालें निकलें और प्रत्येक बाल में सौ दाने हों। अल्लाह जिसे चाहता है बढ़ोतरी प्रदान करता है। अल्लाह बड़ी समाईवाला, जाननेवाला है। (261)
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    जो लोग अपने माल अल्लाह के मार्ग में ख़र्च करते हैं, फिर ख़र्च करके उसका न एहसान जताते हैं और न दिल दुखाते हैं, उनका बदला उनके अपने रब के पास है। और न तो उनके लिए कोई भय होगा और न वे दुखी होंगे। (262)
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    एक भली बात कहनी और क्षमा से काम लेना उस सदक़े से अच्छा है, जिसके पीछे दुख हो। और अल्लाह अत्यन्त निस्पृह (बेनियाज़), सहनशील है। (263)
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   ऐ ईमानवालो! अपने सदक़ों कोएहसान जताकर और दुख देकर उस व्यक्ति की तरह नष्ट न करो जो लोगों को दिखाने के लिए अपना माल ख़र्च करता है और अल्लाह और अंतिम दिन पर ईमान नहीं रखता। तो उसकी हालत उस चट्टानजैसी है जिसपर कुछ मिट्टी पड़ी हुई थी, फिर उस पर ज़ोर की वर्षा हुई और उसे साफ़ चट्टान की दशा में छोड़ गई। ऐसे लोग अपनी कुछ भी कमाई प्राप्त नहीं करते। और अल्लाह इनकार की नीति अपनानेवालों को मार्ग नहीं दिखाता।(264)
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    और जो लोग अपने माल अल्लाह की प्रसन्नता के संसाधनों की तलब में और अपने दिलों को जमाव प्रदान करने के कारण ख़र्च करते हैं उनकी हालत उस बाग़ की तरह है जो किसी अच्छी और उर्वर भूमि पर हो। उस पर घोर वर्षा हुई तो उसमें दुगुने फल आए। फिर यदि घोर वर्षा उस पर नहीं हुई, तो फुहार ही पर्याप्त होगी। तुम जो कुछ भी करते हो अल्लाह उसे देख रहा है। (265)
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   क्या तुममें से कोई यह चाहेगा कि उसके पास खजूरों औरअंगूरों का एक बाग़ हो, जिसके नीचे नहरें बह रही हों, वहाँ उसे हर प्रकार के फल प्राप्त हों और उसका बुढ़ापा आ गया हो और उसके बच्चे अभी कमज़ोर ही हों कि उस बाग़ पर एक आग भरा बगूला आ गया, और वह जलकर रह गया? इस प्रकार अल्लाह तुम्हारे सामने आयतें खोल-खोलकर बयान करता है, ताकि सोच-विचार करो।(266)
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    ऐ ईमान लानेवालो! अपनी कमाई की पाक और अच्छी चीज़ों में से ख़र्च करो और उन चीज़ों में से भी जो हमने धरती से तुम्हारे लिए निकाली हैं। और देने के लिए उसके ख़राब हिस्से (के देने) का इरादा न करो, जबकि तुम स्वयं उसे कभी न लोगे। यह और बात है कि उसकी क़ीमत कम कराके लो। और जान लो कि अल्लाह निस्पृह, प्रशंसनीय है। (267)
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    शैतान तुम्हें निर्धनता से डराता है और निर्लज्जता केकामों पर उभारता है, जबकि अल्लाह अपनी क्षमा और उदार कृपा का तुम्हें वचन देता है।अल्लाह बड़ी समाईवाला, सर्वज्ञ है। (268)
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    वह जिसे चाहता है तत्वदर्शिता प्रदान करता है और जिसे तत्वदर्शिता प्राप्तहुई उसे बड़ी दौलत मिल गई। किन्तु चेतते वही हैं जो बुद्धि और समझवाले हैं। (269)
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  और तुमने जो कुछ भी ख़र्च किया और जो कुछ भी नज़र (मन्नत) की हो, निस्सन्देह अल्लाह उसे भली-भाँति जानता है। और अत्याचारियों का कोई सहायक न होगा। (270)
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   यदि तुम खुले रूप में सदक़ेदो तो यह भी अच्छा है और यदि उनको छिपाकर मुहताजों को दो तो यह तुम्हारे लिए अधिक अच्छा है। और यह तुम्हारे कितने ही गुनाहों को मिटा देगा। और अल्लाह को उसकी पूरीख़बर है, जो कुछ तुम करते हो।(271)
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    उन्हें मार्ग पर ला देने का दायित्व तुम पर नहीं है, बल्कि अल्लाह ही जिसे चाहता है मार्ग दिखाता है। और जो कुछ भी माल तुम ख़र्च करोगे, वह तुम्हारे अपने ही भले के लिए होगा और तुम अल्लाह के (बताए हुए) उद्देश्य के अतिरिक्त किसी और उद्देश्य से ख़र्च न करो। और जो माल भी तुम (नेक कामों में) ख़र्च करोगे, वह पूरा-पूरा तुम्हें चुका दिया जाएगा और तुम्हारा हक़ न मारा जाएगा। (272)
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    यह उन मुहताजों के लिए है जो अल्लाह के मार्ग में घिर गए हैं कि धरती में (जीविकोपार्जन के लिए) कोई दौड़-धूप नहीं कर सकते। उनके स्वाभिमान के कारण अपरिचित व्यक्ति उन्हें धनवान समझता है। तुम उन्हें उनके लक्षणों से पहचान सकते हो। वे लिपटकर लोगों से नहीं माँगते। जो मालभी तुम ख़र्च करोगे, वह अल्लाह को ज्ञात होगा। (273)
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   जो लोग अपने माल रात-दिन छिपे और खुले ख़र्च करें, उनका बदला तो उनके रब के पास है, और न उन्हें कोई भय है और नवे शोकाकुल होंगे। (274)
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   और जो लोग ब्याज खाते हैं, वे बस इस प्रकार उठते हैं जिस प्रकार वह व्यक्ति उठता है, जिसे शैतान ने छूकर बावला कर दिया हो और यह इसलिए कि उनका कहना है, "व्यापार भी तो ब्याजके सदृश है," जबकि अल्लाह ने व्यापार को वैध और ब्याज को अवैध ठहराया है। अतः जिसको उसके रब की ओर से नसीहत पहुँची और वह बाज़ आ गया, तो जो कुछ पहले ले चुका वह उसी कारहा और मामला उसका अल्लाह के हवाले है। और जिसने फिर यही कर्म किया तो ऐसे ही लोग आग (जहन्नम) में पड़नेवाले हैं। उसमें वे सदैव रहेंगे।(275)
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    अल्लाह ब्याज को घटाता और मिटाता है और सदक़ों को बढ़ाता है। और अल्लाह किसी अकृतज्ञ, हक़ मारनेवाले को पसन्द नहीं करता (276)
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    निस्संदेह जो लोग ईमान लाएऔर उन्होंने अच्छे कर्म किए और नमाज़ क़ायम की और ज़कात दी, उनके लिए उनका बदला उनके रब के पास है, और उन्हें न कोई भय होगा और न वे शोकाकुल होंगे। (277)
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    ऐ ईमान लानेवालो! अल्लाह का डर रखो और जो कुछ ब्याज बाक़ी रह गया है उसे छोड़ दो, यदि तुम ईमानवाले हो। (278)
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    फिर यदि तुमने ऐसा न किया तो अल्लाह और उसके रसूल से युद्ध के लिए ख़बरदार हो जाओ।और यदि तौबा कर लो तो अपना मूलधन लेने का तुम्हें अधिकार है। न तुम अन्याय करो और न तुम्हारे साथ अन्याय किया जाए। (279)
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    और यदि कोई तंगी में हो तो हाथ खुलने तक मुहलत देनी होगी; और सदक़ा कर दो (अर्थात मूलधन भी न लो) तो यह तुम्हारेलिए अधिक उत्तम है, यदि तुम जान सको। (280)
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    और उस दिन का डर रखो जबकि तुम अल्लाह की ओर लौटोगे, फिर प्रत्येक व्यक्ति को जो कुछ उसने कमाया पूरा-पूरा मिल जाएगा और उनके साथ कदापि कोई अन्याय न होगा। (281)
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    ऐ ईमान लानेवालो! जब किसी निश्चित अवधि के लिए आपस में ऋण का लेन-देन करो तो उसे लिख लिया करो और चाहिए कि कोई लिखनेवाला तुम्हारे बीच न्यायपूर्वक (दस्तावेज़) लिख दे। और लिखनेवाला लिखने से इनकार न करे; जिस प्रकार अल्लाह ने उसे सिखाया है, उसी प्रकार वह दूसरों के लिए लिखने के काम आए और बोलकर वह लिखाए जिसके ज़िम्मे हक़ की अदायगी हो। और उसे अल्लाह का, जो उसका रब है, डर रखना चाहिए और उसमें कोई कमी न करनी चाहिए। फिर यदि वह व्यक्ति जिसके ज़िम्मे हक़ की अदायगी हो, कम समझ या कमज़ोर हो या वह बोलकर न लिखा सकता हो तो उसके संरक्षक को चाहिए कि न्यायपूर्वक बोलकर लिखा दे। और अपने पुरुषों में से दो गवाहों को गवाह बना लो और यदि दो पुरुष न हों तो एक पुरुष औरदो स्त्रियाँ, जिन्हें तुम गवाह के लिए पसन्द करो, गवाह हो जाएँ (दो स्त्रियाँ इसलिए रखी गई हैं) ताकि यदि एक भूल जाए तो दूसरी उसे याद दिला दे। और गवाहों को जब बुलाया जाए तो आने से इनकार न करें। मामला चाहे छोटा हो या बड़ा एक निर्धारित अवधि तक के लिए है, तो उसे लिखने में सुस्ती से काम न लो। यह अल्लाह की नज़रमें अधिक न्यायसंगत बात है औरइससे गवाही भी अधिक ठीक रहती है। और इससे अधिक संभावना है कि तुम किसी संदेह में नहीं पड़ोगे। हाँ, यदि कोई सौदा नक़द हो, जिसका लेन-देन तुम आपस में कर रहे हो, तो तुम्हारे उसके न लिखने में तुम्हारे लिए कोई दोष नहीं। और जब आपस में क्रय-विक्रय का मामला करो तो उस समय भी गवाह कर लिया करो, और न किसी लिखनेवाले को हानि पहुँचाई जाए और न किसी गवाह को। और यदिऐसा करोगे तो यह तुम्हारे लिएअवज्ञा की बात होगी। और अल्लाह का डर रखो। अल्लाह तुम्हें शिक्षा दे रहा है। औरअल्लाह हर चीज़ को जानता है। (282)
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   और यदि तुम किसी सफ़र में हो और किसी लिखनेवाले को न पा सको, तो गिरवी रखकर मामला करो। फिर यदि तुममें से एक-दूसरे पर भरोसा करे, तो जिसपर भरोसा किया है उसे चाहिए कि वह यह सच कर दिखाए कि वह विश्वासपात्र है और अल्लाह का, जो उसका रब है, डर रखे। और गवाही को न छिपाओ। जो उसे छिपाता है तो निश्चय ही उसका दिल गुनाहगार है, और तुम जो कुछ करते हो अल्लाह उसे भली-भाँति जानता है। (283)
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    अल्लाह ही का है जो कुछ आकाशों में है और जो कुछ धरती में है। और जो कुछ तुम्हारे मन में है, चाहे तुम उसे व्यक्त करो या छिपाओ, अल्लाह तुमसे उसका हिसाब लेगा। फिर वह जिसे चाहे क्षमा कर दे और जिसे चाहे यातना दे। अल्लाह को हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है। (284)
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    रसूल उसपर, जो कुछ उसके रब की ओर से उसकी ओर उतरा, ईमान लाया और ईमानवाले भी, ये सब अल्लाह पर, उसके फ़रिश्तों पर, उसकी किताबों पर और उसके रसूलों पर ईमान लाए। (और उनका कहना यह है,) "हम उसके रसूलों में से किसी को दूसरे रसूलों से अलग नहीं करते।" और उनका कहना है, "हमने सुना और आज्ञाकारी हुए। हमारे रब! हम तेरी क्षमा के इच्छुक हैं और हमें तेरी ही ओर लौटना है।" (285)
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    अल्लाह किसी जीव पर बस उसकी सामर्थ्य और समाई के अनुसार ही दायित्व का भार डालता है। उसका है जो उसने कमाया और उसी पर उसका वबाल (आपदा) भी है जो उसने किया।"हमारे रब! यदि हम भूलें या चूकजाएँ तो हमें न पकड़ना। हमारेरब! और हम पर ऐसा बोझ न डाल जैसा तूने हमसे पहले के लोगोंपर डाला था। हमारे रब! और हमसेवह बोझ न उठवा, जिसकी हममें शक्ति नहीं। और हमें क्षमा करऔर हमें ढाँक ले, और हम पर दया कर। तू ही हमारा संरक्षक है, अतएव इनकार करनेवालों के मुक़ाबले में हमारी सहायता कर।" (286)
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